सुश्री सरोज कंसारी
लेखिका / कवयित्री / शिक्षिका
अध्यक्ष: दुर्गा शक्ति समिति
गोबरा नवापारा राजिम, रायपुर (छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, देहरादून)
लेख –
साधन आधुनिक हों, लेकिन स्वभाव मानवीय रहे
-सुश्री सरोज कंसारी
”यह सदा याद रखना कि हम इंसान हैं, मशीन नहीं!”
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प्राचीन परंपरा और आधुनिक संस्कृति का समन्वय कर हम एक नया इतिहास रच सकते हैं। सात्विक विचारधारा ही श्रेष्ठ परिणाम को जन्म देती है। आधुनिकता और प्राचीन परंपरा के संतुलित निर्वहन से विकास के नए आयाम गढ़े जा सकते हैं।
चिंतन बनाम बहस…किसी भी मुद्दे पर केवल बहस समस्या को जन्म देती है, समाधान के लिए चिंतन आवश्यक है। शांत मन से किया गया सात्विक चिंतन ही श्रेष्ठ परिणाम देता है। आज अधिकांश लोगों की मानसिकता उग्र हो गई है। बात को समझने के बजाय तीखा व्यंग्य, आक्रामक रवैया और उत्तेजित भाव रखना अव्यावहारिक आचरण का परिचायक है। जबकि हर व्यक्ति के भीतर सकारात्मक शक्ति का विशाल भंडार है। मनुष्य के रूप में हर कोई अपने स्तर पर श्रेष्ठ व्यक्तित्व का धनी है, कोई किसी से कम नहीं। आवश्यकता केवल अपनी छिपी क्षमता को पहचानने और समय पर कार्य को अंजाम देने की है।
पीढ़ियों का दृष्टिकोण…हम अक्सर बुजुर्गों से सुनते हैं — “पहले का जमाना कुछ और था।” तब सुंदर विचार, संयमित जीवनशैली, परंपराओं का सम्मान और वेश-भूषा में सभ्यता की झलक मिलती थी। आज के परिवेश में कई बार दम घुटता है। इच्छा होती है कि आज की पीढ़ी उस प्रथा को पुनर्जीवित करे जिसमें जीने का आनंद था।
दूसरी ओर, युवा पीढ़ी कहती है — “समय बदल गया है, यह वैज्ञानिक युग है। दुनिया कहां से कहां आ गई, और आप उसी पुराने ढर्रे की बात करते हैं। हमारे पास सुख-सुविधा, मनोरंजन के पर्याप्त साधन हैं, तो हम पुरानी परंपरा का अनुसरण क्यों करें?”
वास्तव में दोनों पीढ़ियां अपने स्थान पर सही हैं। माहौल के अनुकूल सभी ढलते हैं। समस्या तब आती है जब हम एक-दूसरे की संस्कृति से अपरिचित रहते हैं।
टकराव के बिंदु…युवा वर्ग आधुनिकता के साथ जीवन जीता है, सोशल मीडिया का अधिक उपयोग करता है। बुजुर्गों को कई बातें उचित नहीं लगतीं — देर से उठना, बिना स्नान-पूजा के रसोई में जाना, बिना पूछे होटल में खाना, देर रात घर लौटना, दिनभर मोबाइल में लगे रहना, पारिवारिक जिम्मेदारी न निभाना। यह देखकर बड़े व्यथित होते हैं। उन्हें लगता है आधुनिकता की होड़ में संस्कृति भुलाई जा रही है।
वहीं पढ़े-लिखे युवा हस्तक्षेप पसंद नहीं करते। उन्हें लगता है वे सही हैं। घर के मुखिया की उपेक्षा से बुजुर्ग आहत होते हैं। जब उन्हें सम्मान नहीं मिलता, तब वे पुराने समय को याद कर दुखी हो जाते हैं।
समाधान: समन्वय का मार्ग…युवा और पुरातन पीढ़ी में समभाव स्थापित करने के लिए प्राचीन परंपरा और आधुनिकता का समन्वय ही विकल्प है। विलुप्त हो रही सभ्यता को पुनर्जीवित करना आवश्यक है। पुरातन रीति-रिवाज आने वाली पीढ़ी के लिए पथ-प्रदर्शक हैं, जिनसे मर्यादित जीवनशैली की सीख मिलती है। भटक रहे युवाओं के लिए बुजुर्गों के नियमों का पालन आज भी प्रासंगिक है।
साथ ही, आधुनिकता को अपने ऊपर हावी न होने दें। तकनीकी ज्ञान बढ़ाएं, क्योंकि यह समय की मांग है। वैज्ञानिक आविष्कारों की जानकारी रखें, सोशल मीडिया का सदुपयोग करें, दुरुपयोग नहीं। प्राचीन संस्कृति का अनुसरण करते हुए नवीनता को अपनाएं।
संतुलित भविष्य की ओर…हमें आने वाली पीढ़ी के लिए संस्कारक्षम वातावरण का निर्माण करना होगा, जिससे मतभेद न हों। आधुनिक और पुरानी परंपरा के निर्वाह से विकास का ऐसा आयाम गढ़ें जिससे सभी को लाभ हो। जीवन की दौड़ में कोई पीछे न रहे, और कोई इतना आगे न बढ़े कि भटक जाए।
संतुलित जीवन और सहज मार्ग का आविष्कार हम सब मिलकर करें। ताकि पुरानी परंपरा छूटे नहीं और आधुनिकता से किसी का नुकसान न हो। दोनों के संयोग से एक सुखद भविष्य का निर्माण संभव है।
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