“सिंह की तरह दहाड़ो, भेड़ की तरह मत चलो!”

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सुश्री सरोज कंसारी

लेखिका, कवयित्री एवं शिक्षिक

अध्यक्ष: दुर्गा शक्ति समिति

गोबरा नवापारा (राजिम)

 रायपुर (छ.ग.)

 

              (नया अध्याय, देहरादून)

 

 

                        लेख –

   “सिंह की तरह दहाड़ो, भेड़ की तरह मत चलो!”

  -सुश्री सरोज कंसारी

 

न इतने भावुक बनो कि टूट जाओ, न इतने कठोर कि इंसानियत खो दो !

      ——————————————————

 

ये जिंदगी उन्हीं की सुनती है जो दहाड़ना जानते हैं, गिड़गिड़ाना नहीं। उठो, देखो और जागो! क्योंकि तुम्हारी चुप्पी ही तुम्हारी सबसे बड़ी हार है। जिन्हें दूसरों के पीछे चलने की आदत होती है, उन्हें अपनी मंजिल और उद्देश्य का पता नहीं होता। वे खुद को कमजोर बना लेते हैं, और दूसरों के सहारे चलने की आदत के कारण अपनी ताकत भूल जाते हैं। उनमें अकेले चलने, लड़ने और जीवन को बेहतर बनाने की पूरी शक्ति और सामर्थ्य होती है, लेकिन वे आगे बढ़ने का साहस नहीं जुटा पाते।

 

वे अपनी खुशियों, रुचि और ख्वाहिशों को दूसरों से जोड़ लेते हैं। उनके मन में भविष्य को लेकर एक अजीब-सा भय बैठ जाता है—क्या होगा, जीवन का सफर कैसा होगा, अकेले मुश्किलों का सामना कैसे करेंगे? ऐसे कई सवाल उन्हें घेरे रहते हैं। वे जो अभी हुआ ही नहीं, उसे सोचकर काल्पनिक दुख का बोझ ढोते रहते हैं। हर समय किसी अनहोनी की आशंका से घिरे रहते हैं और बस साथ ढूँढते रहते हैं।

 

ऐसे लोग खुद के दम पर कुछ करने का साहस नहीं करते। वे जिन्हें अपना मान लेते हैं, उन्हीं पर अपने जीवन का हर फैसला छोड़ देते हैं। जब हम अपनी उम्मीदें किसी से जोड़ लेते हैं, तो हमारे हर एहसास में वही व्यक्ति बस जाता है। ठोकरें खाने के बाद भी इंसान संभल नहीं पाता।

 

यह सच है कि हर कोई वफादार नहीं होता, पर हम यह बात समय रहते समझ नहीं पाते। जब किसी को हमारी कमजोरी का पता चल जाता है—कि हमारी खुशियों की डोर उसके हाथ में है—तो उसमें घमंड आ जाता है। वह अपने सुख, सुविधा और स्वार्थ के अनुसार हमारा उपयोग करने लगता है। जब हम खुद अपना मूल्य निर्धारित नहीं कर पाते, तो एक समय के बाद उन रिश्तों में भी अपना सम्मान खो देते हैं जिन्हें हम सबसे अधिक अपना मानते हैं।

 

हमें हर हाल में खुद के साथ खड़ा होना चाहिए। यह याद रखना चाहिए कि लोग किसी भी मोड़ पर बदल सकते हैं। जीवन के इस महासंग्राम में विजयी होने के लिए हमें शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक रूप से लगातार शक्ति अर्जित करते रहना चाहिए। स्वस्थ मन से ही हम जीवन की हर चुनौती का सामना कर सकते हैं। दुर्बल होकर हम किसी के प्रिय नहीं बन सकते, बस दया के पात्र बनकर रह जाते हैं।

 

जीवन में रिश्ते-नाते, मित्र, परिवार, प्रियजनों और हर किसी के प्रति मानवीय संवेदनाएँ रखिए। लेकिन किसी भी रिश्ते के प्रति इतने आसक्त न हो जाएँ कि अगर कभी वह मोड़ पर आपको छोड़ दे, धोखा दे दे, तो आप अपना मानसिक संतुलन ही खो बैठें और दुखी होकर जीना छोड़ दें। और इतने संवेदनहीन भी न बनें कि किसी को अपना बनाकर रोता छोड़ दें और आपका दिल तक न पिघले।

 

खुद की सुरक्षा, आत्म-सम्मान और व्यक्तित्व के विकास के लिए मजबूत बनिए। दुनिया की भीड़ में मत भटकिए। हर दिन कोई अच्छा कार्य करके खुद को धीरे-धीरे निखारते रहिए। अपनी वाणी में मिठास रखिए, शांत और सरल रहिए, लेकिन इतने भी सीधे मत बनिए कि लोग आपको गिराने, हराने और मिटाने की कोशिश करते रहें और आप बस सहते रहें।

 

जहाँ जरूरत हो, वहाँ सिंह बनकर दहाड़िए! गलत का विरोध करने के लिए आवाज बुलंद कीजिए। दुश्मन आपकी सच्चाई की गर्जना से काँप उठे—खुद को इतना मजबूत बना लीजिए। जीवन में भेड़-चाल मत चलिए। ऐसा मत कीजिए कि जहाँ भीड़ दिखे, वहाँ बिना सही-गलत जाने शामिल हो जाएँ। स्वार्थ के लिए लोगों के पीछे-पीछे चलना, गलत बात पर भी हाँ में हाँ मिलाना और चापलूसी करना छोड़ दीजिए। याद रखिए, चालाकी और षड्यंत्र से भले ही आप अपना स्वार्थ सिद्ध कर लें, लेकिन गलत करके आप अपनी ही नजरों में गिर जाएँगे। वह सुकून कभी नहीं मिलेगा जो सिर्फ सत्य के साथ चलने से मिलता है।

 

आपके लिए क्या सही है और क्या गलत, इसका फैसला खुद कीजिए। किसी के कहने से रुकिए मत। अपने सपने और हर जिम्मेदारी खुद निभाइए। कोई आकर मदद कर दे, इस ताक में मत रहिए। बिना मेहनत और संघर्ष के कुछ भी पा लेने का भ्रम पालना मूर्खता है। डर, दर्द और अफसोस से बाहर निकलिए। नेक काम करके अपना श्रेष्ठ देते रहिए। जब आप सही हैं तो डरिए मत। और अगर गलत किया है तो परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहें।

 

भीड़ के पीछे चलना छोड़ो, अपनी राह बनाओ। डर, दूसरों पर निर्भरता और काल्पनिक दुख हमें कमजोर करते हैं, जबकि आत्म-सम्मान, साहस और सत्य का साथ हमें सिंह की तरह दहाड़ना सिखाता है। रिश्तों में संवेदना रखो पर आसक्ति नहीं, सरल रहो पर इतने सीधे नहीं कि कोई तुम्हें कुचल दे। मेहनत के बिना कुछ नहीं मिलता और गलत का विरोध न करना भी एक तरह की कायरता है। कुल मिलाकर, जीवन का सूत्र यही है—खुद पर भरोसा करो, सही के लिए खड़े होओ, और अपना मूल्य खुद तय करो।

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