संवाददाता कन्नौज (उ.प्र.):दीप सिंह
(नया अध्याय, देहरादून)
न्याय की गुहार या व्यवस्था से मोहभंग?
जमीनी विवाद से आहत युवक का टावर पर चढ़ना बना प्रशासनिक संवेदनहीनता पर बड़ा सवाल
कन्नौज: समाज में जब किसी पीड़ित की आवाज बार-बार अनसुनी कर दी जाती है, तब उसका आक्रोश कई बार ऐसे रूप में सामने आता है, जो पूरे प्रशासनिक तंत्र को कठघरे में खड़ा कर देता है। थाना तालग्राम क्षेत्र के सिलुआपुर गांव में घटित घटना ने एक बार फिर यह सोचने पर विवश कर दिया कि आखिर एक युवक को अपनी बात मनवाने के लिए मोबाइल टावर पर चढ़ने जैसा खतरनाक कदम क्यों उठाना पड़ा।
बताया गया कि गांव में स्थित अम्बेडकर पार्क की जमीन के कथित बैनामे को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा था। पीड़ित पक्ष का आरोप है कि जमीन का बैनामा प्रार्थिनी के नाम कर दिया गया, जिसकी शिकायत कई महीने पहले थाना तालग्राम में की गई थी। जब वहां कोई सुनवाई नहीं हुई, तब न्याय की उम्मीद लेकर जिलाधिकारी कार्यालय में भी प्रार्थना पत्र दिया गया। लेकिन लगातार शिकायतों के बाद भी कार्रवाई न होने से पीड़ित पक्ष खुद को ठगा और उपेक्षित महसूस करने लगा।
इसी पीड़ा और निराशा के बीच युवक ने ऐसा कदम उठाया, जिसने पूरे इलाके में सनसनी फैला दी। युवक मोबाइल टावर पर चढ़ गया और अधिकारियों को मौके पर बुलाने की मांग करने लगा। उसने चेतावनी दी कि यदि उसकी बात नहीं सुनी गई तो वह टावर से कूदकर अपनी जान दे देगा, जिसकी जिम्मेदारी कथित धोखाधड़ी करने वालों पर होगी। युवक की इस चेतावनी ने वहां मौजूद लोगों की सांसें थाम दीं।
घटना की सूचना मिलते ही गांव में भारी भीड़ जमा हो गई। हर किसी की निगाहें टावर पर खड़े युवक पर टिकी थीं। माहौल तनावपूर्ण था और किसी अनहोनी की आशंका लोगों को भयभीत कर रही थी। सूचना पाकर थाना तालग्राम पुलिस तत्काल मौके पर पहुंची। पुलिस अधिकारियों ने धैर्य, संयम और सूझबूझ का परिचय देते हुए युवक को समझाने का प्रयास किया। काफी देर चली बातचीत और आश्वासन के बाद युवक सुरक्षित नीचे उतर आया, तब जाकर लोगों ने राहत की सांस ली।
यह घटना केवल एक व्यक्ति के आक्रोश की कहानी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न भी है, जहां समय रहते शिकायतों का समाधान न होने पर लोग कानून और प्रशासन से भरोसा खोने लगते हैं। यदि प्रारंभिक स्तर पर ही पीड़ित की बात गंभीरता से सुनी जाती, तो शायद स्थिति यहां तक न पहुंचती।
सिलुआपुर की यह घटना प्रशासन के लिए एक चेतावनी भी है और समाज के लिए एक संदेश भी कि संवाद, संवेदनशीलता और त्वरित न्याय ही ऐसे तनावपूर्ण हालातों को रोक सकते हैं। क्योंकि जब न्याय की उम्मीद टूटने लगती है, तब व्यक्ति का आक्रोश खतरनाक मोड़ ले सकता है।





