राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
अंतकाल पछतायेगा!
(समकालिक लेख)
भारत में मंदिरों की लूट का मुद्दा बहुआयामी लगता है इसमें ऐतिहासिक, आर्थिक, प्रशासनिक और राजनीतिक कारण उत्तरदायी हैं। मंदिर भारत में सदियों से धन, संस्कृति और शक्ति के केंद्र रहे हैं, इसलिए वे हमेशा लूट के निशाने पर रहे हैं। जैसे हम ऐतिहासिक संदर्भ में देखें तो आक्रमणकारी और राजनीतिक लूट,विदेशी आक्रमण,मध्यकाल में मुस्लिम आक्रमणकारियों (महमूद गजनवी, औरंगजेब आदि) ने सोमनाथ, काशी विश्वनाथ, जगन्नाथ पुरी, मथुरा जैसे मंदिरों को बार-बार लूटा कारण मुख्यतः धन था मंदिरों में भक्तों के चढ़ावे, सोना-चांदी, रत्न और भूमि-जायदाद जमा होती थी। गजनवी ने 1025 में सोमनाथ से भारी खजाना लूटा था। औरंगजेब के काल में भी कई मंदिरों की तोड़-फोड़ और लूट हुई थी।
इतिहास में मंदिर लूट का सबसे बड़ा राजनीतिक कारण था। इतिहासकार रिचर्ड ईटन जैसे विद्वान बताते हैं कि मंदिर राजा की शक्ति का प्रतीक थे। दुश्मन राजा के मंदिर को लूटना/नष्ट करना उसके वैधता को चुनौती देना था। यह धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक था, हिंदू राजा भी प्रतिद्वंद्वी हिंदू राजाओं के मंदिर लूटते थे। ब्रिटिश काल में ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1810-17 के कानूनों से मंदिरों पर नियंत्रण लिया, मिसअप्रोप्रिएशन (दुरुपयोग) के नाम पर 1925 का मद्रास हिंदू रिलीजियस एंडोमेंट्स एक्ट आगे बढ़ा था।
दूसरा कारण आधुनिक भारत में लूट सरकारी नियंत्रण और भ्रष्टाचार स्वतंत्रता के बाद भी कई राज्यों (खासकर दक्षिण भारत तमिलनाडु, आंध्र, केरल, कर्नाटक) में हिंदू मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण जारी है, जबकि मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारे स्वायत्त हैं। संविधान के अनुच्छेद 25(2) के तहत राज्य धार्मिक संस्थाओं की आर्थिक/सेकुलर गतिविधियों को नियंत्रित कर सकता है।
सरकारी नियंत्रण के परिणाम तमिलनाडु HR&CE विभाग 40,000+ मंदिरों को नियंत्रित करता है। आरोप: फंड का दुरुपयोग, छोटे मंदिरों के लिए बड़े मंदिरों का पैसा, भूमि पर कब्जा, मूर्ति चोरी आदि । तिरुपति, सबरीमाला आदि में घोटाले (लड्डू प्रसाद में मिलावट, हुंडी चोरी)। VHP और हिंदू संगठन कहते हैं कि यह “मुस्लिम आक्रमणकारियों और ब्रिटिश” की मानसिकता का विस्तार है सरकार मंदिरों का धन लूटती है और राजनेताओं को ठिकाना देती है।
तीसरा कारण है आंतरिक चोरी और भ्रष्टाचार मंदिरों में अकूत धन (नकद, सोना, चढ़ावा) जमा होता है। इससे लालच बढ़ता है। अयोध्या राम मंदिर (2026) हालिया बड़ा मामला ज्वलंत उदाहरण है चढ़ावे (नकद, सोना-चांदी) की चोरी के आरोप में SIT जांच, 8 गिरफ्तारियां, करोड़ों का घोटाला ट्रस्ट अधिकारियों पर आरोप, फोन डेटा मिटाना, संपत्ति में उछाल, त्याग पत्र का नाटक। यह व्यक्ति विशेष का नहीं , सत्ता समर्थित ट्रस्ट का मामला है, जो राजनीतिक विवाद बना।
काशी विश्वनाथ (1983) चोरी के बाद सरकारी नियंत्रण बढ़ा पर चोरों और आस्था के हत्यारों को सज़ा मिलेगी ? कहना मुश्किल है क्योंकि जहां चिड़िया पर मार सकती थी सीसीटीवी ,तैनात गार्ड के आंखों के नीचे रामलला से बिना डरे,लोभी लालची इतना बड़ा जघन्य अपराध कैसे कर लिए?
अन्य राज्य बेंगलुरु गली अंजनेय स्वामी, विजयपुरा चांदी मूर्ति चोरी, तमिलनाडु में प्राचीन मूर्तियां (1,000+ चोरी 1992-2017) महाराष्ट्र के मंदिर की चोरी जैसे सैकड़ों उदाहरण हैं। मूर्ति की चांदी आँख ,मुकुट चुराने पर पूरा गांव सजा देता था,आज ? मंदिरों में चोरी का एक कारण मूर्ति तस्करी भी है । तमिलनाडु, केरल आदि से प्राचीन ब्रॉन्ज/पत्थर की मूर्तियां विदेशी बाजारों में बिकती हैं। कुख्यात Subhash Kapoor जैसे तस्करों का नेटवर्क बहुचर्चित है।
क्यों होती चोरी मंदिर में ? अन्य मुख्य कारण है अथाह धन तिरुपति, पद्मनाभस्वामी (केरल, खजाना ₹1 लाख करोड़+), राम मंदिर आदि में करोड़ों-खरबों का चढ़ावा, नकद गिनती, स्टोरेज, लेखा में कमजोरियां और सुरक्षा,सेंध का मिलाजुला खेल प्रमुख है। इन सब के प्रशासनिक कमजोरियां भी उतनी उत्तरदायी हैं। ट्रस्ट/बोर्ड में भाई-भतीजावाद, अपर्याप्त CCTV/ऑडिट, राजनीतिक नियुक्तियां। राम मंदिर ट्रस्ट में सरकारी ऑडिट की कमी का मुद्दा उठा पर नतीजा शून्य लगता है।
राजनीतिक हस्तक्षेप कुछ राज्यों में नास्तिक/विरोधी सरकारें मंदिर फंड का इस्तेमाल अन्य कामों (स्कॉलरशिप, राहत) में करती हैं। एक पक्ष कहता है यह भेदभाव है। सामाजिक/आर्थिक: गरीबी, बेरोजगारी से छोटी चोरियां। बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार है। इसके साथ ही कानूनी असमानता सभी धर्मों पर देखी जा सकती है।
समस्या के समाधान की मांग और वास्तविकता देखें तो मंदिर मुक्ति आंदोलन VHP, RSS आदि मंदिरों को हिंदू समुदाय को सौंपने की मांग करते हैं। पारदर्शी ट्रस्ट, डिजिटल ऑडिट, CAG ऑडिट, CCTV, मजिस्ट्रेट निगरानी (काशी विश्वनाथ मॉडल) जरुरी है। कुछ मंदिरों (जैसे जगन्नाथ, तिरुपति) में बेहतर सिस्टम हैं, लेकिन पूर्ण पारदर्शिता की कमी हर जगह देखी जा सकती है।
सरकारें कहती हैं नियंत्रण जरूरी है ताकि सभी जातियों को प्रवेश मिले और फंड का दुरुपयोग न हो। मंदिर लूट का मूल धन का प्रलोभन और प्रबंधन की कमजोरियां है। ऐतिहासिक आक्रमण तो खत्म हो गए, लेकिन आधुनिक “आंतरिक लूट” (सरकारी, ट्रस्ट, कर्मचारी स्तर) जारी है क्योंकि धर्म स्थल अब भी धार्मिकता के नाम पर आर्थिक शक्ति के श्रोत हैं। समाधान में पूर्ण जवाबदेही, स्वायत्त लेकिन पारदर्शी प्रबंधन और कानूनी समानता जरूरी है। भक्तों का विश्वास टूटना सबसे बड़ा नुकसान है—चाहे कोई भी पक्ष हो। यह मुद्दा राजनीतिक रूप से polarized लगता है इसलिए तथ्यों पर आधारित बहस और सुधार की जरूरत है।







