सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री/लेखिका/अध्यापिका
अध्यक्ष: दुर्गा शक्ति समिति,
गोबरा नवापारा-राजिम,
रायपुर, (छत्तीसगढ़)
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
“स्वयं को समझ लेने पर कोई भी तनाव आपको आहत नहीं कर सकता !”
– सुश्री सरोज कंसारी
……………………………………………..
स्वयं को जो समझ ले, वह हार से नहीं डरता,
कमियों को सीख बना ले, वह हर बार संवरता।
टिप्पणियां बयार बन जाएं, प्रयास सीढ़ी बने,
अपनी कहानी का नायक, जा तू बस आगे बढ़ता।
तनाव जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा है, परंतु…उससे आहत होना या न होना पूरी तरह से हमारा अपना प्रयास और हमारी अपनी लड़ाई है। बुद्ध हों या कबीर, इतिहास का कोई भी महनीय संत इसलिए शांत नहीं था कि उसके जीवन में मुश्किलें नहीं थीं; बल्कि वे इसलिए शांत थे क्योंकि उन्होंने स्वयं को पा लिया था। जिस दिन आप खुद को समझकर खुद से प्यार कर लेंगे, संसार की कोई भी ताकत आपको मानसिक चोट नहीं पहुँचा पाएगी।
जब हम स्वयं को समझते हैं, तब छोटी-छोटी बातें भी हमें तोड़ती नहीं हैं। कोई एक टिप्पणी अथवा एक अस्वीकृति हमें घंटों परेशान नहीं करती। हमेशा कद्र करना सीखिए स्वयं की! कमियां ही हमें कमजोर इंसान बनाकर रखती हैं। लेकिन जब हम अपनी कमियों को छुपाने के बजाय उन्हें सुधारने लगते हैं, तो हर असफलता एक नई सीख बन जाती है। फिर दुनिया की कोई भी ताकत हमें झुका नहीं सकती, क्योंकि अपनी कहानी के नायक हम खुद हैं।
ज्ञान ही मनुष्य का सबसे बड़ा कवच है। जो व्यक्ति अपनी ताकत और कमजोरियों को गहराई से समझने की क्षमता रखता है, उसे जीवन में किसी भी असफलता या हार का डर नहीं सताता। वह भली-भांति जानता है कि हार केवल एक पड़ाव होता है, मंजिल नहीं। जीवन में आने वाली समस्याएं और कठिनाइयां हमें तोड़ने के लिए नहीं, बल्कि तराशने के लिए आती हैं। एक समझदार इंसान हर गलती से सीख लेता है और खुद को हर बार पहले से बेहतर बनाते हुए अविरल संवारता जाता है।
“मानव ! तू सब शक्तियों से युक्त है,
तेरा पराभव हो नहीं सकता,
आहत कर सके कोई तुझको,
ऐसा तो मुमकिन हो नहीं सकता।”
लोग आपके बारे में क्या बातें या टिप्पणियां करते हैं, उन्हें खुद पर कभी हावी मत होने दीजिए। उन आलोचनाओं को ठंडी हवा के झोंके (बयार) की तरह मानकर छोड़ दीजिए और अपने कर्मों तथा प्रयासों को सीढ़ी बनाकर ऊपर की ओर चढ़ते जाइए।
संसार में हर प्राणी को किसी न किसी से कोई न कोई समस्या अवश्य होती है, फिर भी वह जीना चाहता है। ध्यान से देखो, तुमने क्या-क्या सोचा था? तुम्हें डिप्रेशन, दुःख या चोट कोई और नहीं पहुँचाता, बल्कि तुम्हारे स्वयं के विचार ही पहुँचाते हैं। खुद को समझना, खुश रखना और शांत रखना केवल हमारी अपनी ज़िम्मेदारी है
अपने इस पावन कर्तव्य-पथ पर बिना रुके, बिना थके, पूरे साहस के साथ अविरल बढ़ते चलना ही हमारा धर्म है। याद रखना ! आप अपनी तकदीर के खुद निर्माता हैं; आप दूसरों के जीवन की कहानी के सह-कलाकार नहीं, बल्कि अपनी खुद की जिंदगी की कहानी के मुख्य नायक हैं, और आपको मुख्य नायक बनकर ही रहना है। आंतरिक रूप से सुदृढ़ इंसान के लिए कोई भी विपत्ति भार नहीं बनती। ऐसे में हम त्याग और समर्पण की भावना सीखते हैं और जीवन के प्रत्येक क्षण को आनंदपूर्वक जीते हैं।
……………………………………………….
*सुश्री सरोज कंसारी*
कवयित्री/लेखिका/अध्यापिका
अध्यक्ष: दुर्गा शक्ति समिति,
गोबरा नवापारा-राजिम,
रायपुर, (छत्तीसगढ़)







