संजय सोंधी
(संयुक्त निदेशक)
शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
महिंद्रा की गाड़ियां और दो अतरंगी कहानियां।
जब एक ने संवारी विरासत और दूसरी ने बिगाड़ी चोरों की किस्मत।
महिंद्रा कंपनी की गाड़ियां अक्सर अपने दमदार प्रदर्शन के लिए जानी जाती हैं, लेकिन हाल ही में सोशल मीडिया से लेकर पुलिस थानों तक दो ऐसी घटनाएं सामने आईं जिन्होंने महिंद्रा के नाम को एक बिल्कुल ही अनोखे अंदाज में चर्चा में ला दिया। एक तरफ जहां जोधपुर की ऐतिहासिक धरोहर को सहेजने में एक ‘पागल बाबा’ की लगन को खुद आनंद महिंद्रा ने सलाम किया, वहीं दूसरी तरफ ओडिशा में चोरों ने इसी कंपनी की एक दमदार गाड़ी का इस्तेमाल ऐसी जगह किया जहां उनका दांव पूरी तरह उल्टा पड़ गया। दोनों ही कहानियां यह साबित करती हैं कि नीयत अगर साफ हो तो इंसान इतिहास रचता है, और नीयत में खोट हो तो बनी-बनाई योजना भी मटियामेट हो जाती है।
पहली कहानी राजस्थान के नीले शहर जोधपुर की है, जहां की ऐतिहासिक बावड़ियां सदियों से पानी सहेजने और स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना रही हैं। समय के साथ ये बावड़ियां कचरे के ढेर में तब्दील हो रही थीं, लेकिन तभी दृश्य में एंट्री होती है करण रौसले की, जिन्हें स्थानीय लोग प्यार और सम्मान से ‘पागल बाबा’ कहते हैं। पिछले दस सालों से यह शख्स बिना किसी सरकारी मदद या लालच के, अकेले ही जोधपुर की इन प्राचीन बावड़ियों को साफ करने के मिशन पर जुटा हुआ है। बाबा की इस निस्वार्थ सेवा और जूनून का एक वीडियो जब सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, तो महिंद्रा समूह के चेयरमैन आनंद महिंद्रा की नजर इस पर पड़ी। आनंद महिंद्रा, जो अक्सर देश के कोने-कोने से ऐसी प्रेरणादायक कहानियों को ढूंढकर उन्हें सराहते हैं, ने तुरंत इस पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने डिजिटल मंच पर सार्वजनिक रूप से पागल बाबा को धन्यवाद कहा और उनके इस जज्बे को सलाम किया। उन्होंने लिखा कि ऐसे लोग ही हमारी असली विरासत के रक्षक हैं, जो चुपचाप समाज को बदलने का काम करते हैं।
अब रुख करते हैं दूसरी घटना का, जो ओडिशा के बालेश्वर जिले से आई है और किसी फिल्मी कॉमेडी से कम नहीं है। बालेश्वर के खैरा थाना क्षेत्र में कुछ शातिर चोरों ने एक एटीएम को उखाड़ने की बेहद दुस्साहसिक योजना बनाई। इसके लिए उन्होंने चुना महिंद्रा कंपनी की सबसे मजबूत और लोकप्रिय गाड़ियों में से एक—महिंद्रा थार को। चोरों ने भारी-भरकम थार गाड़ी को ‘इंडिया वन’ कंपनी के एटीएम से मजबूत रस्सियों और जंजीरों के सहारे बांधा। इसके बाद गाड़ी की पूरी ताकत का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने एटीएम को अपनी जगह से पूरी तरह उखाड़ फेंका और उसे गाड़ी में लादकर रफूचक्कर हो गए। चोरों को लगा होगा कि वे करोड़पति बनने वाले हैं, लेकिन कहानी में ट्विस्ट अभी बाकी था। वे एटीएम को उखाड़ तो ले गए, लेकिन उसकी अत्याधुनिक और मजबूत सुरक्षा तकनीक के आगे बेबस हो गए। चोरों ने हर मुमकिन हथकंडा अपनाया, लेकिन वे उस एटीएम बॉक्स को खोल ही नहीं सके और न ही उसके भीतर मौजूद कैश तक पहुंच पाए। आखिरकार, पुलिस के डर और हताशा में वे भारी-भरकम एटीएम को एक सुनसान जगह पर छोड़कर भाग खड़े हुए। महिंद्रा की थार ने एटीएम उखाड़ने में तो चोरों का साथ दे दिया, लेकिन मशीन की मजबूती ने चोरों की सारी मेहनत पर पानी फेर दिया।
इस घटना के बाद कई लोग यह सोच रहे हैं कि आखिर यह ‘इंडिया वन’ कंपनी क्या है और ‘व्हाइट लेबल एटीएम’ क्या बला होती है, जिसने चोरों के पसीने छुड़ा दिए। अमूमन हम जब भी एटीएम देखते हैं, तो उन पर भारतीय स्टेट बैंक, एचडीएफसी या आईसीआईसीआई जैसे किसी न किसी बैंक का नाम और लोगो छपा होता है। लेकिन व्हाइट लेबल एटीएम इनसे बिल्कुल अलग होते हैं। ये ऐसे एटीएम होते हैं जिनका स्वामित्व और संचालन किसी बैंक के पास नहीं, बल्कि गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC) के पास होता है। ‘इंडिया वन’ देश की ऐसी ही एक प्रमुख कंपनी है जो ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में बैंकिंग सेवाएं पहुंचाने के लिए ये एटीएम लगाती है। चूंकि इन मशीनों पर किसी खास बैंक का ठप्पा नहीं होता, इसलिए इन्हें ‘व्हाइट लेबल’ (यानी बिना किसी ब्रांड के नाम वाला) कहा जाता है। इन एटीएम की सुरक्षा व्यवस्था बेहद पुख्ता होती है। इनमें ऐसे जीपीएस ट्रैकर और सॉलिड सुरक्षा कवच लगे होते हैं कि इन्हें बिना डिजिटल अनुमति या भारी विस्फोटकों के खोलना नामुमकिन होता है। यही वजह थी कि बालेश्वर के चोर थार जैसी शक्तिशाली गाड़ी से इसे खींच तो लाए, पर इसके तिजोरी को छू तक नहीं पाए।
इन दोनों घटनाओं को अगर एक साथ देखा जाए, तो यह जिंदगी के दो अलग-अलग पहलुओं को दर्शाती हैं। एक तरफ जोधपुर के पागल बाबा हैं, जिन्होंने अपनी दस साल की अथक मेहनत से कचरे से भरी बावड़ियों को चमका दिया और आनंद महिंद्रा से देशव्यापी सम्मान पाया। दूसरी तरफ वे चोर हैं जिन्होंने रात के अंधेरे में अपनी पूरी ताकत और महिंद्रा थार की पावर एक एटीएम को चुराने में लगा दी, लेकिन हाथ लगी तो सिर्फ नाकामी और पुलिस का खौफ। यह इस बात का बेहतरीन उदाहरण है कि तकनीक और ताकत चाहे जितनी भी एडवांस हो जाए, अंत में जीत हमेशा सही इरादों और ईमानदारी की ही होती है।







