राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
खलपति
(व्यंग)
लोकतंत्र में नेताओं और उनकी नेतागिरी का कमाल, चुनावी जादू वादे, भूल और भ्रष्टाचार का त्रिकोण साक्षात दर्शन होता है। चुनाव का मौसम आते ही हमारे देश में एक अनोखा त्योहार शुरू हो जाता है जिसे “जुमला पर्व” कहते हैं। इस पर्व में नेता जी मंच पर खड़े होकर ऐसे वादे करते हैं कि लगता है स्वर्ग उतर आने वाला है। बिजली फ्री, पानी फ्री, नौकरी फ्री, लैपटॉप फ्री, और अगर वक्त मिला तो शादी भी फ्री! जनता ताली बजाती है, फूल बरसाते हैं, और नेता जी मुस्कुराते हुए कहते हैं,
“मैं आपका सेवक हूँ, बस एक बार मौका दीजिए।” फिर क्या? वोट पड़ते हैं, गिनती होती है, और..आबरा का डाबरा का कमाल ! और नेता जी जीत जाते हैं। अब जादू का दूसरा चरण शुरू। मेनिफेस्टो? वो तो चुनावी प्रचार की फाइल में कहीं दब गया वादे भूल गए? अरे नहीं, भूले नहीं, उसका नाम ही बदल दिया अब वो “व्यावहारिक कठिनाइयाँ” बजट की कमी है। पुरानी सरकार के नाम से पुछल्ले छोड़ कर वाही वाही लूटी जाती है। कल तक जो नेता सड़क पर खड़े होकर चिल्ला रहे थे “भ्रष्टाचार मुक्त देश बनाएंगे”, आज उसी सड़क पर नई गाड़ी में घूमते हुए कहते हैं, “भाई, सिस्टम ही ऐसा है।” सिस्टम! क्या खूब नाम दिया है।
सिस्टम के बारे में उत्तर प्रदेश का इंजीनियर वीडियो में बता रहे थे कि सिस्टम वो जादुई शब्द है जिसके पीछे छिपकर नेता जी अपनी जेबें भरते हैं। पब्लिक के पैसे से हवाई अड्डे, स्टेडियम, और अपनी नई कोठी। सब कुछ “जनहित” करते हैं। हद तो जब हो जाती है लालची,लम्पट मंदिर तक का चंदा, प्रभु जी के सामने ही लेकर चंपत हो जाते है। बिस्किट चुराने वाला जेल काटता है आस्था चोर पुजे जाते हैं। एक बार एक नेता जी ने चुनाव में वादा किया था –“मैं सत्ता में आया तो अपना बेटा भी सरकारी स्कूल में पढ़ाएगा।” जीतने के बाद बेटा विदेश के सबसे महंगे स्कूल में चला गया। पूछने पर बोले, “अरे, लोकल स्कूल में तो सीट ही नहीं मिली!”
जनता हँसती है, नेता जी भी हँसते हैं क्योंकि व्यंग्य तो उन पर है, लेकिन ठहाका उन पर पड़ता है। राजनीति में सच्चाई ये है कि झूठ बोलना कलाकारी है, वादा भूलना भी एक प्रकार जुमला- विज्ञान अर्थात राकेट साइंस इतनी कठिन है, यह सबके बस की बात नहीं है। भ्रष्टाचार पसंदीदा व्यवसाय बन जाता है ,,एक सं, पत्रकार जी से पूछ रहे थे ऐसा कौन सा विभाग है ,,जहां भ्रष्टाचार नहीं है ? पत्रकार बोले सत्य वचन महाराज !
चुनाव से पहले नेता “गरीब का बेटा” बन जाते हैं जीतने के बाद “जनता के मालिक”। मंच पर “मैं गरीबों का मसीहा हूँ” क्योंकि गरीबी में पला हूं। कभी-कभी तो मजा ये आता है कि नेता जी खुद ही अपने पुराने वीडियो देखकर हैरान हो जाते हैं। “अरे यार, मैंने ये वादा कब किया था? किसने बोल दिया?” फिर अपने सचिव को बुलाकर कहते हैं, “भाई, ये पुराना वीडियो हटवा दो, नया एडिट करो और” हड्डीखोर खुश होकर आठों पहर पूरी बेशर्मी से अनैतिक और कानून के विरुद्ध काम करते हैं।
देश ,समाज और सनातन धर्म से क्या लेना।
फिर भी जनता हर पाँच साल बाद फिर उसी थिएटर में टिकट लेने चली जाती है जिसकी फिल्म देखकर अभी निकले थे। क्यों? क्योंकि विकल्प और भी खतरनाक लगते हैं। एक नेता कहता है “मैं चोर नहीं हूँ”, दूसरा कहता है “मैं कम चोर हूँ”। तीसरा चुपचाप मुस्कुराता है – वो तो प्रोफेशनल है, बोलता ही नहीं खलपति । तो आखिर में एक छोटा सा सवाल पाठकों से है कि नेता बदलते हैं, लेकिन सिस्टम क्यों नहीं बदलता?
क्योंकि सिस्टम का नाम ही “नेतागिरी” है। इस खेल में जनता सिर्फ एक्स्ट्रा है – वोट डालने के लिए, ताली बजाने के लिए, और अगले चुनाव तक चुपचाप इंतजार करने के लिए।
जय हो लोकतंत्र की!
(और जय हो नेताओं की जेबों की भी।)
– राजेंद्र रंजन गायकवाड







