कवयित्री चन्द्रमती चतुर्वेदी
(चन्दू)
बस्ती, अयोध्या धाम, (उ. प्र.)
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
“धरती की पुकार”
मैं धरती हूँ, सुनो मनुज !
अब मेरी भी फरियाद सुनो,
अपने स्वार्थों के आगे,
मत मेरा हर संवाद चुनो।
काट रहे हो वन उपवन सब,
कैसी यह अंधी तैयारी,
सूख रही हैं नदियाँ सारी,
रोती मेरी हर फुलवारी।
धुआँ उगलते कारखानों ने,
नभ का नीलापन छीना,
विष की वर्षा करके तुमने,
जीवन का हर सुख है छीना।
पर्वत घायल, नदियाँ मैली,
सागर भी लाचार हुए,
लोभ-लालसा की अग्नि में,
कितने सुंदर द्वार हुए।
चिड़ियों का कलरव खोया,
सूने हैं अब वन के डाले,
मूक जीव सब पूछ रहे हैं,
कौन बचाए प्राण निराले?
हरियाली का हार पहनकर,
मैं मुस्काती थी हर क्षण,
आज प्रदूषण की चादर में,
घुटता जाता मेरा जीवन।
बूँद-बूँद को तरसे खेती,
किसान हुआ बेबस सारा,
मेघ भी रूठे, प्यासा सावन,
कैसा आया समय हमारा।
यदि अब भी तुम नहीं सँभले,
होगा संकट और विकराल,
सूखेंगे जल, मिटेंगे जंगल,
होगा जीवन बदहाल।
एक-एक पौधा रोपोगे,
फिर मुस्काऊँगी मैं प्यारी,
फूल खिलेंगे, मेघ बरसेंगे,
महकेगी फिर फुलवारी।
जल बचाना, वृक्ष लगाना,
जीवन का आधार बनाओ,
धरती माँ के पावन आँचल को,
फिर से स्वर्ग समान बनाओ।
आओ मिलकर प्रण यह लें हम,
हरित धरा फिर से सजाएँ,
आने वाली हर पीढ़ी को,
सुंदर जीवन दे जाएँ।
धरती माँ की यही पुकार है,
सुन लो हे इंसान हमारे,
प्रेम करो प्रकृति से मिलकर,
तभी बचेंगे प्राण तुम्हारे।






