सौजन्यः अजय प्रताप सिंह, (सम्पादक) दिल्ली
अनिन्दिता दत्त राय
कोलकाता
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
माँ
तू ही जीवन दाता मेरी,
तू ही भाग्य विधाता।
कर्म लेखनी तू है मेरी,
तू ही है सुख की दाता।।
तेरे ममता के दामन में,
तीनों लोकों का सुख है।
दूध पिलाया है जो तूने,
अमृत से भी बढ़कर है।।
छाया बनकर साथ चली तू,
जीवन में हर पल माता।।
कर्म लेखनी तू है मेरी,
तू ही है सुख की दाता।।
लोरी गाती थी जब- जब तू,
निदिया रानी आ जाती।
क्षुधा सताती थी जब मुझको,
देती थी दूधी भाती।।
धूल धूसरित होने पर भी,
चुंबन माथे पर पाता।
कर्म लेखनी तू है मेरी,
तू ही है सुख की दाता।।
उँगली तेरी पकड़ -पकड़ कर,
दुनिया में चलना सीखा।
छोड़ दिया उँगली जब तेरी,
गिर -गिर कर मैने चीखा।।
जितने भी है जग में रिस्ते,
अद्भुत है माँ का नाता।
कर्म लेखनी तू है मेरी,
तू ही है सुख की दाता।।
तीर्थ सभी तेरे चरणों में,
निशदिन शीश झुकाऊं।
तर जाएगा जीवन मेरा,
चरण धूल जो पाऊं।।
कितने है उपकार तुम्हारे,
उनको मैं न गिन पाता।
कर्म लेखनी तू है मेरी,
तू ही है सुख की दाता।






