राजकुमार कुम्भज, इन्दौर
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
दिल्ली दृश्य
_________
कहना कठिन है कि अभिजीत दीपके की भूमिका गति पकड़ेगी अथवा शिथिल हो जाएगी, किन्तु इतना तो तय हो ही गया है, और निर्विवाद हो गया है, कि सीनों में गरमा रही चिंगारियाँ सड़कों पर आ सकती हैं, तथाकथित बहुप्रचारित अपराजित को भी चुनौती दी जा सकती है।
वर्तमान विपक्ष की स्थिति बेहद ही दयनीय दिखाई दे रही है, ख़ुद की अपनी एकमात्र राजनीति ख़ुद को बचाने तक संकुचित हो गई है। विचारों में कोई स्पष्टता नहीं है। दूसरों को कोसते रहने से आखिर कब तक, क्या कुछ हासिल किया जा सकता है?
जनता विकल्प के लिए विशेषतः विकल हो रही है और विकल्प की राजनीति एक-दूसरे में तोड़फोड़ करने तथा एक-दूसरे से मोल-भाव करने में व्यस्त है।
न जाने क्यों प्रतिपक्ष को, कोई ख़ास जन-आंदोलन खड़ा करने की बजाय, दूसरों के सुलगाये चूल्हों पर अपनी रोटियाँ सेंकने की चरित्रगत आदत-सी हो गई है।
सोनम वाँगचुक का अनशन आज-कल में समाप्त हो जाएगा। अभिजीत की आभासी दुनिया भी अपने-अपने दूसरे जरुरी कार्यक्रमों में सक्रिय हो जाएगी। सड़कों पर फेंके गए पत्थर भी समेट लिए जाऍंगे और यहाँ तक कि बहते खून की जगहों को रँगीन फूलों से सजाया जा चुका होगा।
लेकिन देखने और सोचने वाली बात ये रहेगी कि इस बार सवालों के रेलों की रँगत का क्षेत्रफल अनुमानित से संभवतः कुछ और अधिक बड़ा जो हो गया है, उसका अंजाम या हश्र क्या होगा?







