राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
नज्म
सूरज ढलते ही अरमाँ बिखर गए
रात आई तो,आंखों में आंसू सिमट गए।
उम्मीद की किरणें थीं जो,
वो अब धुंधला गईं,
शाम के साए जैसे बढ़े,
दिल की धड़कने थम गईं।
सूरज ढलते ही अरमाँ बिखर गए,
रात आई तो आंखों में आंसू सिमट गए,,,
दिन भर संभाला था
जिस हौसले से दामन को,
अंधेरे ने छू हमें, जज्बात पिघल गए,
जो ख्वाब सजाए थे, वो पल में बिखर गए,
रात आई तो आंखों में आंसू सिमट गए,,,
तारों की महफिल में भी
तन्हाई का पहरा देखा है,
जख्म जो मिला है,
वो बेहद ही गहरा है।
यादों के जुगनू भी
सब चुपचाप गुजर गए,
रात आई तो आंखों में आंसू सिमट गए,,
दीवार-ओ-दर से पूछो
क्या गुजरी है दिल पर,
एक आस में बैठे रहे हम उम्र भर।
जो थे हमारे अपने, वो भी मुकर गए,
रात आई तो आंखों में आंसू सिमट गए,,,
अब तो अंधेरों से अपनी यारी निभाएंगे,
दर्द के इन आँसुओं को मोती बनाएंगे।
कह दो जमाने से कि
हम तो अभी भी जिंदा है, पर
रात आई तो आंखों में आंसू सिमट गए,,,







