राजकुमार कुम्भज
इन्दौर
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
दिमागी-नक्सल के जुमले में…
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दिमागी नक्सल के जुमले में सुविधाओं और पूर्वाग्रहों की पहचान का मुद्दा भी खोजा जा सकता है।
इसे बराऐखास सत्ता-पक्ष और विपक्ष के वरिष्ठ-बुद्धिमान अपने-अपने नजरिए से देखने में कुछ दूसरे ही खास आग्रहों-दुराग्रहों का इस्तेमाल कर सकते हैं, बल्कि करेंगे और कर ही रहे हैं।
रोटी-रोजगार मिले, नहीं मिले, संसद में गर्मागर्म स्वादिष्ट-मसालेदार बहस का तमाशा मिलता रहना चाहिए। तीस पर तुर्रा कहिए कि अखबार तो हैं ही।
कहीं किसी एक लोकोक्ति में कहा भी गया है कि मनोरंजन से भूख मर जाती है?
किसी भी लोकतांत्रिक-व्यवस्था में तलवार अथवा बंदूक की बजाय संवाद ही कारगर हथियार साबित होता रहा है और उम्मीद की जा सकती है कि होता रहेगा।
तमाम-तमाम दबावों और संदर्भों के बावजूद स्मरण रखा जा सकता है कि अप्प दीपो भव: ! बुद्ध ने भी असंभव को संभव तक ले आने का यही रवैया तथा रास्ता प्रतिपादित किया है।
मानाकि बुद्ध के देश में इस वक़्त,न तो कहीं बुद्ध का बुद्धत्व है और न कहीं देश-काल,फिर भी नागरिकों की पहली और आखिरी ख्वाहिश यही है कि सभी जन सुख-शांति का जीवन पाएँ। क्या ये संभव नहीं? एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों!
कलाओं का जादू, अपने नित-नित बदलते जाते अभिप्रायों के रहते, अपनी स्थापनाएँ एक हद तक ही बरकरार रख पाता है।
बाद मुद्दत के आजादी पाई है। पुरखों ने कोड़े खाए हैं, भूखे रहे हैं, सजाएँ काटी हैं। आज फिर से विदेशी पूँजीगत-शक्तियों ने देशभर में अनचाहा-मनचाहा अतिक्रमण कर लिया है। विदेशी कर्ज की जकड़न कुछ इस हद तक त्रस्तता-आग्रही हो गई है कि चारों ओर प्रतिबंध ही प्रतिबंध उपलब्ध हैं।
स्वतंत्र-विकलताएँ बढ़ रही हैं और स्वतंत्र-मान्यताएँ घट रही हैं।
विश्वास और अविश्वास के परंपरागत पैमानों ने दम तोड़ दिया है।
हर कोई शक के दायरे में है। हर किसी पर चाहते, न चाहते हुए भी शक चस्पा कर दिया गया है। निठल्लों की चाँदी हो रही है और मौजूदा सरकार अपने नागरिकों को पानी में चाँद देखने के लिए विशेषतः विवश कर रही है।
धर्म-कर्म के स्थानों पर भीड़ बढ़ती जा रही है और उसी अनुपात में भगदड़ तथा गंदगी का महा-सडाँधभरा साम्राज्य भी। दिक्कत और आपत्ति की बात यही है कि इस भीड़ में वह zen-z और zen-alfa भी तन-मन-धन सहित जोशोखरोश से शामिल है, जो अभी-अभी अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर आंदोलनरत है?
कहना कठिन नहीं है कि दिल्ली दुरस्त…
अमी अस्तो, अमी अस्तो, अमी अस्त…?







