सुनील कुमार वर्मा
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
निदान (लघु कथा)
कर्तव्य और अधिकार बहुत अच्छे मित्र थे।एक बार दोनों में बहस छिड़ गई कि, दोनो में श्रेष्ठ कौन है? जब दोनो की बहस का कोई नतीजा नहीं निकला तब दोनो अपने गुरु के पास पहुंचे। गुरु ने दोनो से बहस के विषय के बारे में जानकारी लेते हुए बहस की वजह पूछी। तब कर्तव्य ने कहा।
“सारे कार्य की जिम्मेदारी मेरी ही क्यों है? दूसरी ओर अधिकार को कुछ नही करना पड़ता है। वह सिर्फ अपने अधिकार की ही बातें करता है और उनका उपयोग करता है। किसी भी तरह के कर्त्तव्यों से उसे कोई मतलब क्यों नही रहता है?”
गुरु ने अधिकार से भी अपना पक्ष रखने को कहा। तब अधिकार ने विनम्रता पूर्वक कहा।
“गुरु देव, लोग मुझे ज्यादा पसंद करते हैं। मेरी मांग ज्यादा है।लोग मुझे पाने के लिए बैचेन रहते हैं और मुझे पाने के लिए एक दूसरे को मरने मारने पर भी उतारू हो जाते हैं। कोई अपना कर्तव्य पूर्ण करना नहीं चाहता है। सबको अपने अधिकार की ही पड़ी रहती है। अब आप ही बताइए इसमें मैं क्या कर सकता हूं?”
दोनों का पक्ष सुनने के बाद गुरु ने दोनों को समझाया फिर कुछ दिनों के लिए कर्त्तव्य को अधिकार और अधिकार को कर्त्तव्य का कार्यभार संभालने का आदेश दिया। गुरु ने दोनो को कुछ दिनो बाद एक नियत तिथि पर गुरु आश्रम में आने को कहा।कर्त्तव्य और अधिकार गुरु के आदेश को स्वीकार करते हुए वहां से चले जाते हैं।
कुछ दिन बीत जाने के बाद नियत तिथि पर दोनों गुरु आश्रम पहुंचते हैं। तब गुरु दोनों से पूछते हैं।
“तुम दोनों की समस्या का निराकरण हुआ या नहीं?”
अधिकार ने गुरु के समक्ष अपनी बातें रखते हुए कहा।
“गुरु देव मुझे यह अनुभव प्राप्त हुआ कि, कर्तव्य पूर्ण करने पर अधिकार की प्राप्ति होती है।”
अधिकार का जवाब सुनकर गुरु ने कर्तव्य से पूछा। तब कर्तव्य ने कहा।
“गुरु देव मुझे भी कुछ ऐसा ही एहसास हुआ कि, कर्तव्य से अधिकार और अधिकार से कर्तव्य की प्राप्ति होती है।”
दोनो की बातें सुनकर गुरु मुस्कुराए और बोले।
“यही बात मैं तुम दोनो को समझाना चाहता था कि, तुम दोनों का अस्तित्व एक दूसरे के बगैर अधूरा और अस्पष्ट है। सिर्फ अधिकार से बात नहीं बनेगी हमें कर्तव्य भी निभाना होगा।”
अधिकार और कर्तव्य को अपनी समस्या और संदेह का सही सही जवाब और समाधान मिल चुका था। दोनो अपने गुरु से आशीर्वाद ग्रहण करते हैं और वहां से प्रस्थान करते हैं।






