राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
आसमाँ गर अपने, इरादों में मगन है,
हमने भी तो छूने की कसम खाई है।
उड़ान भरेंगे हम, हौसलों के पंखों से,
रुकावट को मिटाने की कसम खाई है।
तूफान आएँगे, घने अंधेरे घिरेंगे हमें
हौसले दीप जलाने की कसम खाई है।
चाँद-तारे देखेंगे, हमारी मंजिल को,
आसमाँ की हदें, बुलादियों से शरमाई है।
इरादे वो हैं जो, मिट्टी को सोना बना दें,
हमने भी बेवफा से सीखी, वफाई है।
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चेहरों पे अब वो, पहले सा इकरार भी नहीं,
कहने को सब करीब हैं, पर प्यार भी नहीं।
दीवार-ओ-दर खड़े हैं, उसी शान से मगर,
घर के मकीनों में, कोई इजहार भी नहीं।
मुस्कान ओठों पर है फकत रस्म के तहत,
आँखों में गुफ्तगू का, वो शुमार भी नहीं।
अब खैरियत भी लोग जरूरत पे पूछते,
बे-गर्ज साथ चलने को गम-ख्वार भी नहीं।
तस्वीरें सज रही हैं तअल्लुक की हर तरफ,
अंदर से कोई, शख्स तलबगार भी नहीं।
हाथों में हाथ, थाम के चलते हम-सफर,
मंजिल पे एक-दूसरे का एतबार भी नहीं।






