सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री, लेखिका व शिक्षिका
रिपोर्टर, उद्घोषिका, नवापारा-राजिम,
रायपुर, (छत्तीसगढ़)
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
लेख:
रिश्ते पानी जैसे होते हैं, जतन से रखो तो जिन्दगीभर साथ देते हैं : सुश्री सरोज कंसारी
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रिश्ते ईश्वर का सबसे अनमोल उपहार होते हैं, जिन्हें गुस्से की भेंट नहीं चढ़ने देना चाहिए, बल्कि रोज़ प्यार और इज्जत देकर अपनो के साथ को संजोकर रखना चाहिए। रिश्ते-नाते जीवन के आधार हैं, इन्हें हमेशा संभालकर रखना चाहिए। जिंदगी के साथ रिश्ते हमें हर समय नई उम्मीद देते हैं। बनते-बिगड़ते रिश्तों की डोर को हमेशा प्यार से थामे रखिए। रिश्ते मजबूती से जुड़े रहें, इसके लिए अपनी सोच हमेशा सकारात्मक रखिए और जीवन के हर दौर में रिश्तों में मिठास बनाए रखिए। कुछ पल के क्रोध, लोभ, ईर्ष्या और नफरत से रिश्ते अक्सर टूटते और बिखरते हैं।
जीवन में हर एक रिश्ते का अपनी जगह महत्व है, इसलिए किसी को कम मत आंकिए। अपने किसी भी रिश्ते के प्रति उपेक्षित भाव मत रखिए। अगर रिश्ते जरूरी हैं तो उन्हें दिल में रखिए, प्यार, सम्मान और भरपूर अपनापन दीजिए। हर रिश्ते में आपसी मधुरता बनाए रखिए, अपनो की परवाह कीजिए, उन्हें सुरक्षा दीजिए और आपसी संवाद बनाए रखिए। एक-दूसरे की भावनाओं को समझिए। अपनी सोच हमेशा शुद्ध रखिए और शक, षड्यंत्र, धोखा, झूठ, छल-बैर से दूर होकर रिश्ते बनाइए।
समय रहते अपनों का ध्यान रखिए, उनकी तकलीफ को जानिए, जरूरत को समझिए, सहयोग दीजिए और समस्या का समाधान कीजिए। किसी भी रिश्ते को निभाने में लापरवाही मत कीजिए। जो दिल में हैं उन्हें कभी दर्द मत दीजिए। सुख में भले न मिल सकें लेकिन दुख में हमेशा साथ दीजिए। कमी हो तो सामने सहजता से बताइए, ताने मत दीजिए। नाराजगी हो तो जोर से चिल्लाइए मत, बल्कि प्रेम से समझाइए। गलती हो तो मान लीजिए। झुकने, सुनने, मान लेने और दूसरों को समझने से ही रिश्ते चलते हैं। दुनिया में सबसे अमूल्य स्वास्थ्य, रिश्ते और आपका व्यवहार है, उसे संभालकर रखिए।
आज की व्यस्त और आधुनिक जीवनशैली में अधिक पाने की होड़ और स्वार्थ प्रवृत्ति के कारण रिश्तों में दरारें आ रही हैं। सांसारिक जीवन के निर्वहन में सामाजिक, पारिवारिक और आत्मीय रिश्तों की मजबूती के लिए आत्म-नियंत्रण जरूरी है। जीवन के हर मोड़ पर मानसिक संतुलन बनाए रखिए, संयम, सद्भाव, संस्कार और मर्यादा कभी मत भूलिए। जब क्रोध आए तो कुछ देर मौन होकर विवादित स्थिति को टालने की कोशिश कीजिए।
कविता:
”हे मनुष्यों !
क्रोध से हमेशा बचा कर रखना
इन अनमोल रिश्तों को…
रोज़ प्रेम का पानी देना,
कद्र और प्यार से इन्हें संभालना।”
यह विचारणीय है कि जहाँ हम दूसरों के प्रति सहज, सरल व संवेदनशील होते हैं, वहीं स्वयं के प्रति स्पष्टवादी, गंभीर और संकल्पबद्ध रहते हैं। स्वभाववश हमें क्रोध आ जाता है या कोई अन्य हमें क्रोधित कर देता है, किंतु क्रोध करना सर्वथा अनुचित है। ऐसे समय में आत्म-नियंत्रण ही सबसे अधिक अनिवार्य गुण है। बस अच्छे कर्म करते रहिए और अपनी जिम्मेदारी को ईमानदारी से निभाते रहिए, परिणाम सही मिलेंगे, बस धैर्य रखिए।






