कवि- अशोक कुमार यादव
मुंगेली, छत्तीसगढ़
संस्थापक/अध्यक्ष यादव समाज सेवा समिति।
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
राखी : भाई-बहिनी के तिहार
धरसा तोर जोहत हवंव,
आँसू डबडबागे आँखी।
आवत होही मोर बहिनी ह,
बाँधे ल मोला राखी।।
नान्हेपन म खेलेन-कूदेन,
करेन हम हँसी-ठिठोली।
काबर मोर ले दुरिहा चलदे,
टोरके मया के डोरी।।
शोर-पता नइ आवय तोर,
नइ आवय चिट्ठी-पाती।
आवत होही मोर बहिनी ह,
बाँधे ल मोला राखी।।
धुकुर-धुकुर जिवरा करथे,
घेरी-बेरी आवथे सुरता।
तोर बिना मन नइ लागय,
मँय होगे हँव तोरे पुरता।।
सबके बहिनी मन आगें,
थारी म बरगे दीया-बाती।
आवत होही मोर बहिनी ह,
बाँधे ल मोला राखी।।
झन भूलाबे मोला तँय ह,
मोर मयारू दुलौरिन दीदी।
संग हमर कभू मत छुटय,
जिनगी भर मरती-जीती।।
बिहनिया ले अगोरत हँव,
अब पहावय झन सँझाती।
आवत होही मोर बहिनी ह,
बाँधे ल मोला राखी।।
बजार ले मोर बर लाबे राखी
अउ लाबे केरा, मिठई।
आरती उतारके टीका लगाबे,
राखी पहिराबे कलई।।
हर बछर तोर मानगुन करहूँ,
हर बिपत ह हर जाही।
आवत होही मोर बहिनी ह,
बाँधे ल मोला राखी।।





