संजय सोंधी
(संयुक्त निदेशक)
शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
मानसिक स्वास्थ्य: विकसित भारत 2047 के मार्ग का अनदेखा पत्थर।
भारत वर्ष 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में तेजी से अग्रसर है, लेकिन देश की एक बहुत बड़ी आबादी का मानसिक स्वास्थ्य इस राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा के सामने एक गंभीर चुनौती बनकर खड़ा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार, भारत में लगभग 15 करोड़ लोगों को किसी न किसी प्रकार की मानसिक स्वास्थ्य देखभाल की तत्काल आवश्यकता है। देश की कुल जनसंख्या का करीब 10 से 15 प्रतिशत हिस्सा किसी न किसी प्रकार के मानसिक विकार जैसे अवसाद, चिंता या अन्य गंभीर विकारों से जूझ रहा है। चिंताजनक तथ्य यह भी है कि लगभग 80 प्रतिशत पीड़ितों को समय पर इलाज या सहायता नहीं मिल पाती, जिसे भारत में ‘ट्रीटमेंट गैप’ के रूप में देखा जाता है। इस विशाल खाई का मुख्य कारण सामाजिक कलंक, जागरूकता की कमी और स्वास्थ्य सेवाओं का बुनियादी ढांचा कमजोर होना है। भारत में प्रति एक लाख आबादी पर केवल 0.75 मनोरोग चिकित्सक उपलब्ध हैं, जो वैश्विक मानकों की तुलना में बेहद कम है। यह भारी कमी सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर अत्यधिक दबाव डालती है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर बड़े सरकारी अस्पतालों तक, मानसिक बीमारियों के इलाज के लिए संसाधन बेहद सीमित हैं, जिससे केंद्र और राज्य सरकारों पर वित्तीय और ढांचागत बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है।
मानसिक स्वास्थ्य संकट केवल एक चिकित्सा समस्या नहीं है, बल्कि यह देश की कार्यक्षमता और आर्थिक उत्पादन को भी सीधे तौर पर प्रभावित करता है। भारत दुनिया का सबसे युवा देश माना जाता है, लेकिन मानसिक तनाव, अवसाद और बर्नआउट की वजह से देश की युवा कार्यशक्ति की उत्पादकता में भारी गिरावट आ रही है। एक अध्ययन के मुताबिक, मानसिक अस्वस्थता के कारण कर्मचारियों की अनुपस्थिति, काम पर ध्यान केंद्रित न कर पाना और समय से पहले सेवानिवृत्ति जैसे मामले तेजी से बढ़े हैं। कॉर्पोरेट और असंगठित दोनों क्षेत्रों में इसका प्रतिकूल प्रभाव देखा जा रहा है। लैंसेट और अन्य वैश्विक रिपोर्टों का अनुमान है कि मानसिक बीमारियों के कारण भारत को 2012 से 2030 के बीच लगभग 1.03 ट्रिलियन डॉलर (लाखों करोड़ रुपये) का आर्थिक नुकसान होगा। यह राशि देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) पर एक प्रत्यक्ष और भारी प्रहार है। यदि इस आर्थिक नुकसान को नियंत्रित नहीं किया गया, तो भारत की 2047 तक विकसित अर्थव्यवस्था बनने की रफ्तार धीमी हो सकती है।
इसके अतिरिक्त, समाज पर मानसिक बीमारियों का सामाजिक और आर्थिक प्रभाव बेहद चिंताजनक है। जब परिवार का कोई सदस्य गंभीर मानसिक रोग से ग्रस्त होता है, तो उसकी देखभाल का अधिकांश खर्च परिवार की जेब से ही जाता है। भारत में जेब से होने वाला स्वास्थ्य खर्च पहले से ही काफी अधिक है, और लंबे समय तक चलने वाले मानसिक इलाज के कारण कई परिवार गरीबी रेखा से नीचे धकेले जा रहे हैं। देखभाल करने वाले सदस्यों का भी आर्थिक उत्पादन प्रभावित होता है, जिससे पूरे समाज की बचत क्षमता और क्रय शक्ति कम होती है। समाज में मानसिक अस्वस्थता के कारण पारिवारिक विघटन, आत्महत्या की बढ़ती दर और सामाजिक असमानता जैसी समस्याएं जन्म ले रही हैं। इसलिए, यदि भारत को 2047 तक वास्तव में एक सशक्त, समृद्ध और विकसित राष्ट्र बनना है, तो मानसिक स्वास्थ्य को सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति का मुख्य स्तंभ बनाना होगा। जब तक देश का प्रत्येक नागरिक मानसिक रूप से स्वस्थ, समर्थ और सशक्त नहीं होगा, तब तक आर्थिक वृद्धि का पूर्ण लाभ उठा पाना और विकसित भारत का सपना साकार कर पाना असंभव रहेगा।







