राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
आदमी खिलौना
(कहानी)
वक्त, हालात और भाग्य, तीन ऐसे अदृश्य धागे हैं, जो इंसान की जिंदगी के ताने-बाने को बुनते हैं। जब ये तीनों एक साथ किसी इंसान के दिमाग से खेलते हैं, तो एक गहरा मनोवैज्ञानिक द्वंद्व शुरू होता है। यह कहानी है माधव की, जो कभी वक्त का लाडला था, लेकिन हालात के एक थपेड़े ने उसे भाग्य के चक्रव्यूह में ला खड़ा किया।
वक्त का गुरूर माधव शहर का एक सफल और बेहद महत्वाकांक्षी बिजनेसमैन था। उसका मानना था कि “भाग्य” जैसी कोई चीज नहीं होती, इंसान अपना भाग्य खुद लिखता है। उसके पास वक्त था, पैसा था और हर फैसले पर उसका पूरा नियंत्रण था, वह घड़ी की सुइयों को अपने इशारे पर नचाता था।
उसका एक ही सिद्धांत था “कमजोर लोग भाग्य का रोना रोते हैं, और मजबूत लोग वक्त को मुट्ठी में रखते हैं।” वह अपनी हर कामयाबी का श्रेय खुद को देता और दूसरों की नाकामयाबी को उनका आलस समझता। उसका मनोविज्ञान पूरी तरह से अहंकार और नियंत्रण की भावना से संचालित था।
हालात का तमाशा, वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता। साल 2026 की शरुआती एक सर्द रात को माधव की जिंदगी ने करवट ली। एक बहुत बड़ा आर्थिक संकट आया, और माधव की कंपनी रातों-रात दिवालिया होने की कगार पर पहुंच गई। उसी हफ्ते, एक भीषण कार दुर्घटना में उसके दोनों पैरों ने काम करना बंद कर दिया।अचानक, हालात बदल गए जो इंसान कल तक बोर्ड मीटिंग्स में हुक्म चलाता था, वह अब एक व्हीलचेयर पर सिमट चुका था।
अब माधव के पास सोचने के लिए बहुत वक्त था, लेकिन करने के लिए कुछ नहीं। हालात ने उसके दिमाग पर गहरा मनोवैज्ञानिक असर डाला कंट्रोल खोने का डर जो इंसान सब कुछ नियंत्रित करना चाहता था, वह अब पानी के गिलास के लिए भी दूसरों पर निर्भर था।
पहचान का संकट बिना पैसे और रूतबे के, उसे अपना वजूद खोखला लगने लगा। अवसाद (Depression) उसका वही दिमाग, जो कभी नए आइडियाज सोचता था, अब खुद को कोसने में जुट गया।
भाग्य का खेल और मनोवैज्ञानिक बदलाव एक दिन, माधव के पुराने बंगले के बगीचे में एक बूढ़ा माली काम कर रहा था। माधव ने गुस्से और हताशा में उससे कहा, “देखो बाबा, मेरी मेहनत, मेरा दिमाग… सब कुछ खत्म हो गया। क्या यही मेरा भाग्य था?” बूढ़े माली ने मुस्कुराकर एक गहरी बात कही “बाबूजी, जब आपके पास सब कुछ था, तब वह आपका वक्त था। आज जो आपके पास नहीं है, वह हालात हैं। लेकिन इन दोनों के बीच आप मानसिक रूप से कैसे प्रतिक्रिया देते हैं, वही आपका भाग्य तय करता है। भाग्य बाहर नहीं, आपके भीतर है।“इस बात ने माधव के दिमाग में एक मनोवैज्ञानिक विस्फोट किया। उसने महसूस किया कि वह बाहरी परिस्थितियों को नहीं बदल सकता। लेकिन वह अपनी मानसिक स्थिति (Mindset) को बदल सकता है।
उसने भाग्य को एक ‘अभिशाप’ के रूप में देखना बंद कर दिया और उसे एक ‘अवसर’ के रूप में स्वीकार किया। एक नई शुरुआतमाधव ने व्हीलचेयर पर बैठे-बैठे ही अपने दिमाग का इस्तेमाल करना शुरू किया। उसने शेयर मार्केट और ऑनलाइन कंसल्टेंसी का काम सीखा। शुरुआत में कई बार असफलता मिली, जिसे पहले का माधव कभी बर्दाश्त नहीं कर पाता। लेकिन अब, उसका मनोविज्ञान बदल चुका था। वह समझ गया था कि हालात अस्थाई होते हैं। धीरे-धीरे, उसकी नई कंपनी चल पड़ी। दो साल के भीतर, माधव ने न केवल अपना खोया हुआ आर्थिक साम्राज्य वापस पा लिया, बल्कि वह मानसिक रूप से पहले से कहीं ज्यादा शांत और मजबूत इंसान बन चुका था।
अब माधव जब पीछे मुड़कर देखता है, तो मुस्कुराता है। उसने अपनी डायरी के पहले पन्ने पर लिखा “वक्त हमें अवसर देता है, हालात हमारी परीक्षा लेते हैं, और जब हम अपने बदले हुए मनोविज्ञान के साथ उन हालातों से लड़ते हैं… तब जाकर हमारा भाग्य चमकता है।







