राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
गजल
ग़म की गजल लिखूँ या तन्हाई का नग़मा,
दिल के जख्मो से, बहता लहू जमा-जमा।
रोज़ रातें कटती हैं आँसुओं की बारिश-सी,
टूटे ख्वाब बिखरे हैं, हर कहीं रमा-जमा।
यादें आती हैं तो, चाँद भी डूब जाता है,
तन्हाई में जलता है दिल बस थमा-थमा।
किसी का इंतजार है, भिड़े दरवाजे को,
हवा ढूँढती है हमें, पता नहीं कहाँ-जमा।
दुनिया की रौनक़ें, लगती हैं बेमानी-सी,
खुद के साये से बातें, करता जवाँ-जमा।
ग़म की गहराई में, डूबा हूँ एक अरसे से,
गजल बिखरी हुई है मेरी बस यहाँ- वहां,
किसको क्या कहें, दर्द तो है अपना साया,
लिख लूँ जो भी है, रहेगा बस बयाँ-जमा।
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