सुश्री सरोज कंसारी
(कवयित्री, लेखिका व शिक्षिका)
रिपोर्टर एवं उद्घोषिका
नवापारा-राजिम, रायपुर (छत्तीसगढ़)
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
आलेख:
जीते जी सेवा करना ही सच्चा श्राद्ध है
: सुश्री सरोज कंसारी
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पितृ श्राद्ध से पूर्वजों की आत्मा होती है तृप्त।
बुजुर्ग माता-पिता की सेवा से पूर्वजों का मिलता है। आशीर्वाद पूर्वजों के प्रसन्न होने से वंशज दीर्घायु, सुखी व समृद्ध होते हैं। मानव तन यूँ ही नहीं मिला, कई जन्मों के पुण्य कर्मों के फलस्वरूप हम इस धरा पर आए हैं। इस जीवन को पल्लवित-पुष्पित व संरक्षित करने में कई तत्व सहायक होते हैं। यह शरीर पंच तत्वों से निर्मित है – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। जो हमें सतत जीवनोपयोगी ऊर्जा प्रदान करते हैं। जन्म व मृत्यु के बीच जो सफर हम करते हैं, उसी में हम सारे पुण्य-पाप अर्जित करते हैं। समय की रफ्तार में हम बहते ही जाते हैं, पता नहीं चलता, हम जो कर रहे हैं वह सही है या गलत? व्यस्तम दिनचर्या में आत्म-मंथन का अवसर ही नहीं मिल पाता, जो कि बहुत ही जरूरी है। इंसान के साथ दो बातें हैं – एक कर्म और दूसरा भाग्य, कर्म हमारे हाथ में है, भाग्य ईश्वर के पास। यह जरूरी हो जाता है कि कर्म किस दिशा में कर रहे हैं? यह जानना और भाग्य के लिए ईश्वर की परम सत्ता को मानना। अर्थात आत्म-विश्वास, दया-करुणा, धर्म-सहयोग, पवित्र भाव रख धैर्य रखना। मन, वचन और कर्म से किसी का बुरा न करना। सतत सक्रिय व कर्मठ रहना, ईमानदारीपूर्वक अपने दायित्व का निर्वहन करते हुए आगे बढ़ना, यही है कर्म।
जन्म से लेकर मृत्यु तक हम पर अनेक लोगों का उपकार होता है। जो हमें प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जीवन को गति प्रदान करने में निस्वार्थ सहयोग करते हैं। हम ऋणी हैं उन सबके हृदय से, हर प्राणी, जीव-जंतु और प्रकृति के प्रति। आभार व्यक्त करना चाहिए और उनके प्रति अपने कर्तव्य को हर परिस्थिति में निभाना चाहिए। वैसे तो हम पर कई ऋण होते हैं, लेकिन देव, पितृ व ऋषि ऋण – ये तीन हैं, जिसमें पितृ ऋण सबसे प्रमुख है। इसमें माता, अन्य रिश्तेदार और पूर्वज भी सम्मिलित हो जाते हैं। जिनसे हम कभी उऋण नहीं हो सकते। भारतीय संस्कृति पुरातन होने के साथ ही बहुत संस्कारित और धर्म-आध्यात्म में आस्था की सीख देती है, सभी के प्रति सम्मान व आस्था के भाव व्यक्त करती है। हम प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल पक्ष से अपने पूर्वजों से आशीर्वाद लेने, उन्हें तृप्त करने के लिए पितृ श्राद्ध करते हैं। जिसमें लगातार पंद्रह दिन पिंडदान, पूजन, हवन करते हैं। ऐसी मान्यता है कि पितृ पक्ष में, हमारे पूर्वज घर के आँगन में आते हैं, और जो भी हम उन्हें अर्पित करते हैं, उन्हें वे ग्रहण करते हैं। कौए को पितरों का वाहक माना जाता है, इसलिए सबसे पहले इस पक्ष में कौए के लिए भोजन रखा जाता है।
शास्त्रानुसार पितृ श्राद्ध करने से पूर्वजों की आत्मा को मोक्ष मिलता है, वे शांत रहते हैं और उनके प्रसन्न होने से वंशज दीर्घायु, धन-धान्य से पूर्ण होते हैं, सुख-समृद्धि बढ़ती है, रोग-शोक, दुख-संताप दूर होते हैं। विधि-विधानपूर्वक श्राद्ध करने से पिता, दादा और परदादा तीनों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। कुछ परंपरा और रीति-रिवाज शास्त्रसम्मत होती हैं, जिसे स्वीकार करना ही पड़ता है, उपेक्षा हम नहीं कर सकते। अति अंधविश्वासी होना गलत है, जिससे हमारी मानसिकता कुंठित होती है, लेकिन धर्म व आध्यात्म आत्मा के विषय हैं। शरीर नश्वर है पर आत्मा अजर-अमर है, जिसे झुठला नहीं सकते। पितर पक्ष का बहुत ही महत्व होता है। अप्रत्यक्ष रूप में पूर्वज हमारे बीच इस पक्ष में मौजूद होते हैं, वे सच्चे भाव के भूखे होते हैं। अगर शुद्ध हृदय से पूजन कर हम हमारे पूर्वजों को कुछ देते हैं, तो उसे वे ग्रहण कर असीम स्नेह और आशीष की घनेरी छाया हमारी पीढ़ी को प्रदान करते ही हैं। कभी-कभी आप स्वयं महसूस करते होंगे, अचानक लगता है कोई आसपास है। कुछ अनजान आवाज, चीखें हमें सुनाई देती हैं, व ज्ञान के अभाव में हम भयभीत हो जाते हैं। किसी संत-महात्मा, ज्ञानी-अनुभवी लोगों से जानकारी लेने पर बताते हैं कि कुछ आत्मा सदैव हमारे आसपास होती हैं, रक्षा के लिए। हमसे बातें करना चाहती हैं। जिस घर में प्रतिदिन पूर्वजों का स्मरण किया जाता है, उनकी अच्छाइयों का बखान, अपने बच्चों के पास कर उनका अनुकरण करने की सीख देते हैं, ऐसी जगह पर पूर्वज किसी न किसी रूप में विद्यमान होते हैं। हमें किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुँचाते। जिस घर में आपसी कलह-द्वेष होता है, परिवार के सदस्य आपस में प्रेम, स्नेहपूर्वक मिल-जुलकर नहीं रहते और पूर्वजों के दिए संस्कारों का पालन नहीं करते, वहाँ वे खुद को अपमानित महसूस करते हैं, उनकी आत्मा रोती है, कराह निकलती है, कभी सिसकती है, तब हमें परेशानी का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में गृह-शांति हवन-पूजन, पिंडदान और पूर्वजों का सम्मान करने, उनकी शांति के लिए यज्ञ-हवन की सलाह दी जाती है। जिससे उनकी आत्मा बेवजह न भटके। पितृ पक्ष में पूरी श्रद्धा-भक्ति से पितरों का स्मरण कर विधि-विधान से पूजा करें। जितनी शक्ति उतनी ही भक्ति करें। दिखावे के लिए कोई भी कर्मकांड न करें। मन और आत्मा से शुद्ध भाव लेकर उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट कर सुख-शांति, सर्वमंगल की कामना करें और जाने-अनजाने में हुई भूल के लिए क्षमा याचना करें। पितृ पक्ष का एक दूसरा पहलू भी है, जिसे हम अक्सर उपेक्षित करते हैं, जानते हैं पर मानते नहीं, स्वीकार नहीं करते। एक छोटी सी भूल की सजा परिवार को, हमारी आने वाली पीढ़ी को भुगतनी पड़ती है। अच्छी बात है हम पूर्वजों की तृप्ति के लिए पूजन करते हैं, जिनके शुभ परिणाम हमें मिलते ही हैं। आपके घर बड़े-बुजुर्ग हैं, वे कोई भी हो सकते हैं – माता-पिता, दादा-दादी, चाचा-चाची, बुआ-बहन, जो आपके लिए समर्पित हैं। आपसे उम्मीद रखते हैं, आपकी वजह से उनकी आँखों में आंसू हैं, सक्षम होते हुए भी आप उन्हें दो वक्त का भोजन नहीं दे सकते। बीमार होने पर इलाज नहीं कराते, सम्मान नहीं करते, ऊँची आवाज में बात करते हैं, उन्हें ताना देते हैं, वे बीमार एक कोने में सहारे के इंतजार में बैठे होते हैं और आप अपनी दुनिया में मस्त रहते हैं। उनसे कभी प्यार के दो बोल नहीं बोल सकते। अपने परिवार के लोगों की परवाह न कर दूसरों का साथ देने का ढोंग कर वाह-वाही लूटते हैं, ऐसी परिस्थिति में आप कितने भी तीर्थधाम कर लें, पिंडदान, पूजन, यज्ञ-हवन कर लें, पूर्वज कभी स्वीकार नहीं करेंगे, न ही आपको आशीर्वाद मिलेगा। आप सोचेंगे इतने धर्म, दान-पुण्य करने पर भी कष्ट क्यों मिल रहा है? तब अपने घर के हर कोने में झांककर देखिए! आपकी वजह से कोई दुखी तो नहीं, आपको कोई पुकार तो नहीं रहा, कहीं आप बुजुर्ग माता-पिता की अवहेलना तो नहीं कर रहे हैं। सबसे बड़ी पूजा माता-पिता की है। उनसे वंचित तो नहीं। अगर आप सब स्वीकार कर भूल को सुधार लें और जीवित व्यक्ति की सच्ची सेवा कर लें, तो निश्चित ही आपकी पीढ़ी भी आपको वही मान-सम्मान और प्यार देगी और पूर्वजों के आशीर्वाद आपको हर मुश्किल में हल देंगे। पितृ पक्ष में श्राद्ध की सार्थकता तभी पूर्ण होगी जब आप अपने घर के बड़े-बुजुर्ग और आप पर जो आश्रित हैं, उनकी सेवा करेंगे, उनका ध्यान रखेंगे, अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करेंगे। जो जीवित हैं, जीवन भर उनको कष्ट दिए और मरने पर स्वादिष्ट पकवान बनाकर भंडारे का आयोजन कर आप दुनिया के सामने ढोंग कर सकते हैं। ऊपर बैठा भगवान तो सबके कर्मों का हिसाब रखता है, उसे क्या जवाब दोगे? इसलिए सारे तीर्थ बेकार हैं अगर आप जीते जी किसी को सुख न दें। और मृत्युउपरांत फोटो को माला पहनाकर आँसू बहाते हैं, क्या ऐसा करने से आपके सारे बुरे कर्म धुल जाएंगे, नहीं? आप अपने बच्चों को संस्कार दें, जो पास हैं उनको सम्मान दें, हर खुशियां आपके दामन में होंगी और पूर्वजों के आशीर्वाद से फिर आप सदा ही फूलेंगे-फलेंगे।






