राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
कालचक्र !
अदृश्य, अविरल चल रहा है
कोई नहीं देखता इसकी गति,
न ध्वनि, न छाया, न कोई निशान,
फिर भी यह चल रहा है अनवरत।
पल-पल बीतते हैं चुपके से,
सपनों के महल ढह हैं हर पल
युवापन झुकता है, धीरे-धीरे,
और कोई नहीं कहता “रुको!”
नदी की तरह, बहता है समय,
किनारे बदलते, रहते हैं रोज़
हम हैं कि खड़े, उसी धारा में,
एहसास कर रहें है, बहुत देर बाद।
कल जो था, आज नहीं रहा,
आज जो है, कल नहीं रहेगा,
यह चक्र घूमता है, निरंतर,
बिना थके, बिना रुके, दोस्त
हे रंजन! जाग, थोड़ा ठहर,
इस अदृश्य चक्र को पहचान,
क्योंकि जब एहसास होगा,
तब बहुत देर हो चुकी होगी।






