संजय सोंधी
(संयुक्त निदेशक)
शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
भारत का बदलता सामरिक परिदृश्य: परमाणु डक्ट्रिन में व्यावहारिक और सूक्ष्म संतुलन की आवश्यकता।
विश्व की वर्तमान भू-राजनीतिक स्थिति और दक्षिण एशिया में उभरती सुरक्षा चुनौतियां भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति के समक्ष एक नया मोड़ प्रस्तुत करती हैं। भारत का वर्तमान परमाणु सिद्धांत सिद्धांत रूप में मुख्य रूप से दो स्तंभों पर टिका है— ‘नो फर्स्ट यूज़’ (पहले प्रयोग न करने की नीति) और ‘क्रेडिबल मिनिमम डिटेरेंस’ (विश्वसनीय न्यूनतम निवारण)। वर्ष 2003 में आधिकारिक रूप से अपनाए गए इस डक्ट्रिन ने लंबे समय तक भारत को एक जिम्मेदार और शांतिप्रिय परमाणु शक्ति के रूप में वैश्विक पटल पर स्थापित किया है। हालांकि, बीते दो दशकों में क्षेत्रीय सुरक्षा परिदृश्य में व्यापक बदलाव आए हैं। भारत के दोनों पड़ोसियों द्वारा अपनाई जा रही आक्रामक सैन्य रणनीतियां, आधुनिक मिसाइल प्रौद्योगिकियों का विकास और विशेष रूप से सामरिक यानी ‘टैक्टिकल न्यूक्लियर वेपन्स’ (कम दूरी और छोटे प्रभाव वाले परमाणु हथियार) के विकास की दिशा में उठाए जा रहे कदम इस बात का स्पष्ट संकेत देते हैं कि भारत को अपनी नीति पर पुनर्विचार करना होगा।
सामरिक परमाणु हथियारों का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक युद्ध के दौरान सीमित क्षेत्र में किसी भी बड़े सैन्य अभियान को निष्प्रभावी बनाना होता है। जब पड़ोसी देश पारंपरिक युद्ध की सीमा को कम करने के लिए इन छोटे हथियारों के प्रयोग की धमकी देते हैं, तो इससे एक गंभीर सुरक्षा असंतुलन पैदा होता है। भारत की मौजूदा घोषित नीति के तहत यदि देश पर किसी भी प्रकार का परमाणु हमला होता है, तो भारत बड़े पैमाने पर आक्रामक जवाबी कार्रवाई (मासिव रिटेलिएशन) करेगा। लेकिन व्यवहार में, किसी छोटे सामरिक हथियार के जवाब में पूर्णकालिक और व्यापक परमाणु हमला करने का विकल्प कई नीतिगत और व्यावहारिक चुनौतियां पैदा करता है। यही कारण है कि भारतीय सुरक्षा विशेषज्ञों और रणनीतिज्ञों के बीच यह बहस तेज हो गई है कि क्या भारत को अपने घोषित डक्ट्रिन को पूरी तरह से बदले बिना इसमें कुछ व्यावहारिक और सूक्ष्म परिवर्तन करने चाहिए।
औपचारिक रूप से अपने मूल सिद्धांतों का त्याग किए बिना परमाणु डक्ट्रिन को अधिक प्रभावी और आक्रामक संदेश देने वाला बनाया जा सकता है। इसके लिए भारत को आधिकारिक दस्तावेज बदलने के बजाय अपने सामरिक संचार, सैन्य अभ्यास और तैयारियों के माध्यम से अपनी नीति में लचीलेपन और अनिश्चितता (रणनीतिक अस्पष्टता) का समावेश करना होगा। जब तक विरोधी को यह स्पष्ट नहीं होगा कि भारत किसी सामरिक परमाणु हमले का जवाब किस स्तर पर देगा, तब तक निवारण (डिटेरेंस) की विश्वसनीयता बनी रहेगी। यदि भारत अपनी नीति में यह संदेश स्पष्ट कर देता है कि किसी भी प्रकार का परमाणु हमला—चाहे वह सामरिक हो या पारंपरिक, छोटा हो या बड़ा—भारत की ओर से अत्यंत कठोर और विनाशकारी जवाबी कार्रवाई को आमंत्रित करेगा, तो यह विरोधी की आक्रामक सोच पर अंकुश लगाने का काम करेगा।
इसके अलावा, ‘क्रेडिबल मिनिमम डिटेरेंस’ की अवधारणा को समय के साथ अद्यतन करने की आवश्यकता है। ‘न्यूनतम’ का अर्थ स्थिर नहीं हो सकता, यह विरोधी की क्षमताओं और हथियारों के आकार पर निर्भर करता है। चीन द्वारा अपने परमाणु शस्त्रागार का तेजी से विस्तार और आधुनिकीकरण तथा मिसाइल रक्षा प्रणालियों का विकास यह स्पष्ट करता है कि भारत का ‘न्यूनतम’ निवारक ढांचा तकनीकी रूप से अत्यधिक सक्षम, अजेय और आधुनिक होना चाहिए। इसके तहत भारत को अपनी ‘न्यूक्लियर ट्रायड’ (थल, नभ और जल से परमाणु हमले की क्षमता) को और अधिक मजबूत करना होगा, विशेषकर परमाणु संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियों की संख्या और क्षमता में वृद्धि करके सेकंड-स्ट्राइक क्षमता को अचूक बनाना होगा।
नीति में बिना आधिकारिक बदलाव किए प्रभावी संदेश देने का एक तरीका यह भी है कि भारत अपनी वायु रक्षा प्रणाली, मिसाइल रक्षा ढांचे और हाइपरसोनिक प्रौद्योगिकी को और सशक्त करे। इससे विरोधी को यह संदेश जाएगा कि भारत न केवल हमले का सहने और जवाब देने में सक्षम है, बल्कि वह दुश्मन के हमले को हवा में ही विफल करने की क्षमता भी रखता है। अंततः, भारत को अपनी परमाणु नीति के मूल दर्शन से भटके बिना अपनी परिचालन तैयारियों, त्वरित निर्णय प्रक्रिया और प्रतिक्रियात्मक रणनीतियों में इतना लचीलापन लाना होगा जिससे भारत का परमाणु निवारक पूरी तरह से प्रासंगिक, क्रेडिबल और किसी भी दुस्साहस को रोकने में पूरी तरह सक्षम बना रहे।







