संजय सोंधी
(संयुक्त निदेशक)
शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
गांधी जयंती का ‘कैश बैक’ और नया-नवेला सत्य।
आज 2 अक्टूबर है, यानी बापू का जन्मदिन। साल में यही एक दिन आता है जब पूरा देश अचानक से सत्य, अहिंसा और साफ-सफाई के प्रति ऐसा जागरूक होता है कि लगता है कल सुबह तक रामराज्य स्थापित होकर ही रहेगा। लेकिन सूरज ढलते ही यह सारा गांधीवाद अगले 2 अक्टूबर तक के लिए फिर से आलमारी में बंद होकर सो जाता है।
आज के समय में बापू के विचारों की स्थिति कुछ ऐसी है कि वे दिल में कम और नोटों पर ज्यादा याद आते हैं। देश का हर वर्ग बापू को अपनी सहूलियत के हिसाब से याद करता है और उनके सिद्धांतों का ऐसा ‘कस्टमाइजेशन’ करता है कि खुद बापू भी देखते तो अपनी लाठी छोड़ चश्मा पोछने लगते।
शुरुआत करते हैं हमारे देश के युवा वर्ग से। युवाओं के लिए गांधीवाद का मतलब बापू के वो मशहूर ‘तीन बंदर’ हैं, जिन्हें उन्होंने थोड़ा डिजिटल बना लिया है। बुरा मत देखो—यानी जब तक कोई कंट्रोवर्सी या रील न हो, तब तक कुछ मत देखो। बुरा मत सुनो—यानी हेडफोन लगाओ और दुनिया के झंझटों से दूर रहो। और बुरा मत बोलो—यानी जब तक कमेंट सेक्शन में कोई ट्रोल न करना हो, तब तक चुप रहो। युवाओं के लिए गांधीगिरी का मतलब किसी को फूल देकर ‘गेट वेल सून’ बोलना नहीं, बल्कि इंस्टाग्राम पर बापू का एक ब्लैक एंड व्हाइट फोटो पोस्ट करके नीचे ‘रिस्पेक्ट’ लिखना और फिर स्वाइप करके रील्स देखना है।
अब आते हैं हमारे समाज के मध्यम वर्ग पर। मध्यम वर्ग के लिए गांधी जी त्याग का प्रतीक कम और छुट्टियों के मसीहा ज्यादा हैं। साल भर दफ्तर की घिसी-पिटी जिंदगी से परेशान यह वर्ग 2 अक्टूबर का इंतजार किसी त्यौहार की तरह करता है। उनके लिए बापू का सबसे बड़ा योगदान यह है कि वे एक ‘ड्राई डे’ और पक्की सरकारी छुट्टी देकर जाते हैं। इस वर्ग का गांधीवाद रसोई से शुरू होकर टीवी के रिमोट पर खत्म होता है। बात अगर अहिंसा की आए, तो वे बात-बात पर सड़क पर ऑटो वाले से झिड़कियां तो ले लेंगे, लेकिन चाय की टपरी पर बैठकर पूरे देश को अहिंसा का ज्ञान देना नहीं भूलेंगे।
उच्च वर्ग और कॉरपोरेट दुनिया का गांधीवाद तो और भी अनोखा है। इनके लिए बापू एक बेहतरीन ‘ब्रांड एंबेसडर’ हैं। खादी जो कभी गरीबों का वस्त्र हुआ करती थी, आज मॉल के बड़े-बड़े शोरूम में लग्जरी फैशन बनकर बिक रही है। पाँच हजार का खादी का कुर्ता पहनकर जब कोई साहब एयर-कंडीशंड गाड़ी से उतरते हैं, तो ऐसा लगता है मानो सादगी का नया मॉडल बाजार में लॉन्च हुआ हो। कॉरपोरेट दफ्तरों में 2 अक्टूबर को ‘स्वच्छता अभियान’ का नाटक होता है, जहाँ साफ-सुथरे फर्श पर दो-चार सूखे पत्ते फेंककर एमडी साहब झाड़ू के साथ पोज देते हैं और फोटो सीधे लिंक्डइन पर पोस्ट हो जाती है।
राजनैतिक और सामाजिक मंचों पर तो गांधी जी की उपयोगिता बस वोटों के समीकरण और भाषणों की शोभा बढ़ाने तक सीमित रह गई है। हर कोई अपनी सहूलियत के हिसाब से उनके अहिंसा के सिद्धांत की व्याख्या करता है। अगर अपना फायदा हो तो ‘एक गाल पर थप्पड़ पड़े तो दूसरा आगे कर दो’, और अगर सामने वाला विरोधी हो तो ‘लाठी में बड़ा दम है’ वाला राग अलापा जाता है।
सच तो यह है कि आज का समाज गांधी जी को बहुत मानता है, बशर्ते वे गुलाबी रंग के दो हजार वाले या हरे रंग के पाँच सौ वाले नोट पर मुस्कुराते रहें। विचार के रूप में हमने बापू को इतने संदूक में बंद कर दिया है कि अगर वे आज वापस आ जाएं, तो अपनी ही प्रतिमाओं पर चढ़ी धूल देखकर कहेंगे—”भाई, अगली बार से मुझे बस एक दिन के लिए याद मत करना, मुझे चैन से इतिहास के पन्नों में ही रहने दो।”






