सौजन्यः सुनील चिंचोलकर
डॉ. ऋचा यादव
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
“जलन” (लघु कथा)
“मुझे जलने से बहुत डर लगता है…”
आशीष से रूबी ने धीरे से कहा।
“देखो ना, मुझे रोज सपना आता है—मैं जल रही हूँ… मैं मरने के बाद भी जलना नहीं चाहती…” उसकी आवाज कांप रही थी।
आशीष ने उसके हाथ थामे।
“तुम इतनी डरती क्यों हो?”
रूबी ने अपने हाथ दिखाए—छोटे-छोटे जले के निशान।
“बचपन से… कभी रोटी बनाते हुए जल गई, कभी कुकर से… ये डर अब तक गया ही नहीं…”
कुछ पल खामोशी रही।
“सुनो ना…” रूबी फिर बोली, “मरने के बाद मुझे मत जलाना… प्लीज…”
आशीष मुस्कुराया, “ठीक है, नहीं जलाएंगे।”
“तो फिर क्या करोगे?” रूबी ने मासूमियत से पूछा।
आशीष ने एक कागज उसकी ओर बढ़ाया—
“ये देखो… देहदान का फॉर्म है।”
रूबी चौंकी, “देहदान?”
“हाँ,” आशीष बोला, “तुम्हें जलाया नहीं जाएगा… बल्कि तुम्हारे जाने के बाद भी तुम जिंदा रहोगी—किसी की आँखों में, किसी की किडनी में, किसी के दिल में…”
रूबी कुछ देर चुप रही।
“जलने से तो डरती हूँ… पर इससे नहीं डरूँगी…”
“तो भरोगी ये फॉर्म?” आशीष ने पूछा।
रूबी हल्के से मुस्कुराई,
“हाँ… कम से कम… मैं कहीं न कहीं जिंदा तो रहूँगी…”
उसने पेन उठाया और फॉर्म पर साइन कर दिए।





