डा. बीना सिंह रागी
भिलाई, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
झूठा तर्पण, सच्चा दर्पणकविता
(कविता)
जिंदगी भर जो तरसते रहे एक-एक निवाले को,
आज ढूँढ रहे हो कौओं को खीर खिलाने को।
बूढ़ी आँखों के दीये बुझ गए अंधेरे में,
तुम व्यस्त रहे बस अपनी ही गृहस्थी के घेरे में।
दवा की पर्ची जो कोने में पड़ी धूल खाती थी,
माँगने पर दो सूखी रोटी, झिड़की मिल जाती थी।
लाठी टिकाकर जो बाप चौखट पे बैठा रहता था,
उसके खाली पेट को बस सन्नाटा ही सहता था।
आज पितृपक्ष में आँगन में पंडित जी बैठे हैं,
कल तक जो औलाद बने फिरते बड़े ऐंठे हैं।
थालियाँ सजाकर आज तर्पण का नाटक
रचाया है,
जमाने को दिखाने को ढेर सारा पुण्य कमाया है।
अगर जीते जी दो निवाले प्रेम के खिला
दिए होते,
तो आज काक- गिद्ध को खुश करके यूँ पाप न छुपा रहे होते।
यह श्राद्ध नहीं, बस अपनी आत्मा का छलावा है,
जमाने को आईना दिखाता यह कड़वा
दिखावा है।
बीना ने रखा जो तथ्य है बिल्कुल सच
रागी आप सबसे पूछती है क्या यही है पितृपक्ष






