आचार्य अवधेश झा
गंघटी आश्रम, धर्मागत पुर
पिलखी मुरौल, मुजफ्फरपुर
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
“समय”
तुम गीता गायत्री गंगाजल हो !
तुम पवित्र सतयुग की राज महल हो!!
तुम दीवारों पर उकेरी हुई कतिपय आकृति !
तुम भारत की मर्यादा का राज तिलक हो!!
तुम पवित्र सतयुग की राज महल हो!!
तुमने देखे दशावतार
मत्स्य,कूर्म,वाराह,कच्छप, नृसिंह,वामन,अवतार
किया प्रलय परशुराम बन शोषे आतातायी महान!
राम कृष्ण बुद्ध बन
उपदेशों का किया बखान!!
तुम सागर की लहरे तुम हीं शीतल जल हो!
तुम पवित्र शतयुग की राज महल हो!!
मातृ देव और पितृ देव हैं
तू ने बहुत सुझाया!
ले वीणा करबद्ध सुरों से सरगम सारे बनाया !!
तू ने हीं वेदों की भाषा
सारे जग को दे दी!
पूर्ण पवित्र किया जननी को
आत्मा पुलकित होती!!
तू हीं सुरसर सलिल कमलचित!
निर्मल पावन स्थल हो!!
तुम पवित्र सतयुग की राज महल हो!!






