सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री/लेखिका/शिक्षिका/रिपोर्टर/उद्घोषिका
नवापारा-राजिम, रायपुर – छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
लेख:
आत्मज्ञान के बिना जीना व्यर्थ होता है
: सुश्री सरोज कंसारी
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मनुज की ललक जब कुछ करने के लिए लगातार बनी रहती है, तो उसे उसके कार्य की प्रगति में कोई बाधा नहीं डाल सकता। व्यक्ति को अपने सही पथ पर बढ़ते जाना चाहिए। हमने माना है कि जो भी इस संसार में इज्जत, मान-सम्मान कमा लेता है, उसे ही हैवान और नीच लोग नीचे गिराने की कोशिश में लगे रहते हैं। आज संसार में अन्याय बढ़ नहीं रहा, बल्कि बढ़ाया जा रहा है। आवश्यकता है हमें जागरूकता से जीने की। कौन क्या कहता है इस पर ध्यान न देकर अपने कर्मों में लीन रहना चाहिए।
व्यक्ति को औरों में दोष नहीं निकालना चाहिए, अपने भीतर देखना और जानना चाहिए, जिससे वह अपने दोषों को जान सके और खुद को समझ सके। मनुज को जो ये जीवन मिला है, ये जीने के साथ-साथ इसे जानने के लिए भी होता है। इसे तभी जाना जा सकता है जब आत्मज्ञान होगा, बिना आत्मज्ञान के सब व्यर्थ है, इसलिए होश में जीना बहुत मायने रखता है।
ये जीवन मानवों ने अधिक जटिल बना दिया है, सहजता से जीना बहुत कम लोग जानते हैं। सहजता यानी जिसमें कोई दिखावा नहीं होता, होती है तो बस सरलता और सौम्यता। सादगी ही इंसान को उच्च कोटि का बनाती है। हमारे गाँधी, शास्त्री चाहे कोई भी हों, सादगी से ही वो महनीय बने थे।
आदमी मुसाफिर ही होता है, आता-जाता तो है, पर वह करके क्या जाता है, यह ज्यादा मायने रखता है। कुछ ऐसा कर जाना चाहिए जो लोग याद करते रहें। आदमी जो चाहे कर सकता है।
आज हमें जागरूकता, संवेदनशीलता और सहनशीलता अपनाने की आवश्यकता है। इन्हें अपनाना चाहिए। सबका भला हो, वो सब जो सही हैं, अपने कार्य, अपनी मेहनत और अपनी लगन से अपना जीवन चलाते हैं। हमें उदार होकर जीना तो है, पर सभी के प्रति दया नहीं रखनी चाहिए, सब मानव नहीं हैं, अधिकतर तो दानव समान ही हैं।
अतः मनुष्य का कर्तव्य होना चाहिए कि वह ज्ञान को केवल पढ़े नहीं, बल्कि सहजता से जिए। जब व्यक्ति होश में जीता है, तो उसका हर कर्म पूजा बन जाता है और हर विचार प्रेरणा। ऐसा जीवन ही खुद के लिए शांति और समाज के लिए प्रकाश का कारण बनता है। अंत में यही समझ आता है कि जीवन का वास्तविक लक्ष्य जो होता है – खुद को जान लेना।







