राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
आरंभ और अंत
(कविता)
जहाँ बीज धरती की गोद में सोता है,
वहीं से उगता है, जीवन का अंकुरण।
पत्ते खिलते हैं, फूल मुस्काते हैं प्यारे,
फिर वही पत्ते झरते, धूल बन जाते हैं।
नदी की धारा, कहीं से निकलती है,
कहीं सागर में मिलकर, खो जाती है।
सूरज उगता है, पूर्व दिशा की ओर से,
अस्त होता है, पश्चिम के आगोश में।
प्रकृति एक चक्र है, आदि से अनंत का,
आरंभ और अंत एक ही साँस में बसते हैं,
जो जन्म लेता है, एक दिन मृत्यु को पाता है,
जो मिलता है, वही रूठकर बिछड़ जाता है।
पेड़ की जड़ें, धरती को पकड़े रहती हैं,
शाखाएँ आसमान, छूने को मचलती हैं।
एक दिन में वही पेड़ सूखकर गिरता,
और नए बीज / पौधों को जन्म देता है।
तो क्या प्रकृति, आरंभ है अंत का?
या अंत ही आरंभ, का दूसरा नाम है?
दोनों एक ही, सिक्के के दो पहलू हैं,
एक नृत्य के दो ताल हैं, एक साज़ पर।
प्रकृति मुस्काती और रोती है एक साथ,
जीवन देती है, कभी कभी ले जाती है।
यही तो उसकी नियमित नियति है “रंजन”
जहाँ अंत नए आरंभ का, द्वार खोलता है।







