कवयित्री चन्द्रमती चतुर्वेदी (चन्दू )
बस्ती, अयोध्या धाम
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
प्रेम के रंग में रंगी चुनरिया,
मोहन देखि लजाय गई।
नैनन में बसि गये साँवरिया,
सुधि-बुधि मेरी जाय गई।
वंशी की धुनि सुनि बावरी भई,
लोक-लाज बिसराय गई।
मन-मंदिर में श्याम विराजे,
तन की सुधि भी जाय गई।
कुंजन-कुंजन ढूँढ़त फिरूँ मैं,
श्याम कहाँ छिपि जाय गए।
कदंब तले जब दर्शन पायो,
प्राण सफल हो जाय गए।
मोर मुकुट की छवि निरखी तो,
नैनन नीर बहाय गए।
पीताम्बर की छटा निहारी,
रोम-रोम हरषाय गए।
अधरन पर मुसकान मनोहर,
हिय में तीर चलाय गई।
चितवन की इक बान लगी तो,
सारी सुधि बिसराय गई।
नाम तुम्हारा जपत-जपत ही,
साँस-साँस महकाय गई।
श्याम-सुधा की एक बूँद ने,
जीवन-धारा बहाय गई।
चन्द्रमती कहे प्रेम अगम है,
वेद न इसका भेद कहे।
जिसके हिय में श्याम समाए,
उसको दूजा कौन रहे।
प्रेम-पंथ पर शीश धरि चलना,
जग की रीति भुलाय गई।
जेहि लागी सोई जान सके है,
बाकी बात न समझाय गई।







