सौजन्यः डॉ.यल.कोमुरा रेड्डी
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
फूलों की छटा, लोकगीतों की गूँज और सांस्कृतिक
चेतना से खिला एस.आर.आर. महाविद्यालय परिसर।
प्री-बतुकम्मा समारोह में प्रकृति, परंपरा और तेलंगाना
की सांस्कृतिक अस्मिता का भव्य उत्सव।
प्राचार्य प्रो. कल्वकुण्टा रामकृष्णा बोले—बतुकम्मा तेलंगाना की सांस्कृतिक आत्मा और सामुदायिक चेतना का जीवंत प्रतीक है।
करीमनगर: 9 अक्टूबर 2026: एस.आर.आर. राजकीय कला एवं विज्ञान महाविद्यालय (स्वायत्त), करीमनगर में महिला सशक्तिकरण विभाग के तत्वावधान में तेलंगाना की समृद्ध लोक-संस्कृति और पारंपरिक विरासत के प्रतीक प्री-बतुकम्मा समारोह का भव्य आयोजन किया गया। रंग-बिरंगे फूलों, पारंपरिक लोकगीतों और उत्साहपूर्ण सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से महाविद्यालय परिसर उत्सवमय हो उठा। कार्यक्रम में प्राचार्य, प्राध्यापक, विभिन्न विभागों के अध्यक्ष, एन.एस.एस. समन्वयक, गैर-शैक्षणिक कर्मचारी तथा छात्र-छात्राओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
बतुकम्मा तेलंगाना की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतीक : प्राचार्य कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. कल्वकुण्टा रामकृष्णा ने बतुकम्मा के सांस्कृतिक, सामाजिक और दार्शनिक महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बतुकम्मा केवल एक धार्मिक अथवा मौसमी त्योहार नहीं, बल्कि तेलंगाना की आत्मा, पहचान और सांस्कृतिक मूल्यों का जीवंत प्रतीक है।
उन्होंने कहा, “जिस प्रकार आत्मा शरीर को जीवन प्रदान करती है, उसी प्रकार बतुकम्मा तेलंगाना की सांस्कृतिक चेतना को जीवंत बनाए रखता है। यह प्रकृति के प्रति सम्मान, लोक-परंपराओं के संरक्षण और सामुदायिक एकता का सुंदर संदेश देता है।”
प्राचार्य ने आगे कहा कि विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए शैक्षणिक गतिविधियों के साथ-साथ सांस्कृतिक विरासत का ज्ञान और उसका संरक्षण भी आवश्यक है। ऐसे आयोजन विद्यार्थियों में अपनी मातृभूमि, लोक-परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति सम्मान की भावना विकसित करते हैं। उन्होंने कार्यक्रम में छात्राओं की सक्रिय भागीदारी की सराहना की।
प्रकृति से जुड़ाव का सांस्कृतिक दर्शन है बतुकम्मा : डॉ. कडारू सुरेंदर रेड्डी
इस अवसर पर टी.जी.सी.जी.टी.ए. के राज्य अध्यक्ष एवं जंतु विज्ञान विभाग के सह-आचार्य डॉ. कडारू सुरेंदर रेड्डी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि बतुकम्मा तेलंगाना की लोक-संस्कृति का विशिष्ट उत्सव है, जो लोगों को अपनी जड़ों, अपनी भूमि और प्रकृति से जोड़ता है।
उन्होंने कहा, “बतुकम्मा केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि एक संपूर्ण सांस्कृतिक दर्शन है। फूलों के माध्यम से प्रकृति के प्रति प्रेम, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने वाली यह परंपरा तेलंगाना की सांस्कृतिक आत्मा को प्रतिवर्ष नई ऊर्जा प्रदान करती है।”
उन्होंने इस बात पर बल दिया कि आधुनिक जीवनशैली और तकनीकी प्रगति के दौर में भी पारंपरिक उत्सवों का संरक्षण आवश्यक है, क्योंकि ये हमारी सांस्कृतिक पहचान को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाते हैं।
रंग-बिरंगे फूलों और लोकगीतों से जीवंत हुआ महाविद्यालय परिसर
समारोह का प्रमुख आकर्षण छात्राओं द्वारा प्राकृतिक एवं सुगंधित फूलों से तैयार किए गए आकर्षक बतुकम्मा रहे। पारंपरिक परिधानों में सजी छात्राओं ने रंग-बिरंगे फूलों से सुसज्जित बतुकम्मा के चारों ओर एकत्र होकर पारंपरिक लोकगीत गाए तथा लोकनृत्य प्रस्तुत किए। उनकी उत्साहपूर्ण प्रस्तुतियों ने तेलंगाना की लोक-संस्कृति की सुंदरता और सामूहिक उल्लास को सजीव कर दिया।
पूरे परिसर में फूलों की मनमोहक छटा, लोकगीतों की मधुर गूँज और छात्राओं के उत्साह ने उत्सव को विशेष बना दिया। इस आयोजन ने विद्यार्थियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने तथा पारंपरिक कलाओं और लोक-साहित्य के महत्त्व को समझने का अवसर प्रदान किया।
महिला सशक्तिकरण विभाग और सभी विभागों की सक्रिय भागीदारी
इस कार्यक्रम को सफल बनाने में महाविद्यालय के तेलुगु, हिन्दी, अंग्रेज़ी, कंप्यूटर विज्ञान, गणित, भौतिकी, रसायन विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, जंतु विज्ञान, इतिहास, अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान, लोक प्रशासन तथा वाणिज्य सहित विभिन्न विभागों के अध्यक्षों एवं प्राध्यापकों ने सक्रिय सहयोग दिया। एन.एस.एस. कार्यक्रम अधिकारियों, महिला सहायक आचार्यों, सह-आचार्यों तथा अन्य संकाय सदस्यों की भागीदारी ने आयोजन को व्यापक स्वरूप प्रदान किया।
प्राचार्य प्रो. कल्वकुण्टा रामकृष्णा ने कार्यक्रम के सफल आयोजन और विद्यार्थियों में सांस्कृतिक चेतना जागृत करने के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने महिला सशक्तिकरण सेल की संयोजिका एम. अर्चना, उप-प्राचार्य पी. नितिन पाठक एवं टी. राजैया, श्रीमती हरजौत कौर, श्रीनिवास रेड्डी, संजीव , श्रीनिवास आयोजक दल तथा सभी सहयोगी संकाय सदस्यों की प्रशंसा की।
कार्यक्रम में महाविद्यालय के विभिन्न विभागों के अध्यक्षों, प्राध्यापकों, एन.एस.एस. अधिकारियों, गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों तथा बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं की उपस्थिति रही।

प्री-बतुकम्मा समारोह ने यह संदेश दिया कि सांस्कृतिक परंपराएँ केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान की पहचान और भविष्य की पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी हैं। प्रकृति के प्रति सम्मान, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक गौरव का संदेश देने वाला यह आयोजन महाविद्यालय की शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों में एक महत्त्वपूर्ण कड़ी साबित हुआ।






