कवयित्री चन्द्रमती चतुर्वेदी (चन्दू )
बस्ती, अयोध्या धाम
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
मैं राधा हूँ बरसाने की।
मिला सुकून है तुमसे मुझको,
मैं राधा हूँ बरसाने की।
सुत यशोदा के तुम गोकुल के,
चित्त चुराकर कहाँ छुपे हो,
कह दो बात बहाने की।
मिला सुकून है तुमसे मुझको,
मैं राधा हूँ बरसाने की॥
मोर मुकुट सिर पर धर लेते,
मुरली मधुर बजाते हो,
नैनों से कुछ कह जाते हो,
फिर क्यों दूर चले जाते हो?
मैं तो सुध-बुध भूल गई हूँ,
रीति यही दीवाने की।
मिला सुकून है तुमसे मुझको,
मैं राधा हूँ बरसाने की॥
यमुना तट पर साँझ ढले जब,
मन तुमको ही ध्याता है,
मधुबन की हर डाली-डाली,
श्याम तुम्हारा नाम सुनाता है।
पायल छनके, मनवा तरसे,
आस लगी मिल जाने की।
मिला सुकून है तुमसे मुझको,
मैं राधा हूँ बरसाने की॥
तुम बिन सूना-सूना सावन,
तुम बिन फीकी बहार है,
तुम हो तो हर साँस सुहानी,
तुम बिन जीवन बेकार है।
तुमसे ही तो प्रीत हमारी,
तुमसे आस निभाने की।
मिला सुकून है तुमसे मुझको,
मैं राधा हूँ बरसाने की॥
कभी कदंब तले आ जाना,
मुरली की धुन छेड़ जाना,
मन के सूने मंदिर में तुम,
प्रेम-दीप फिर से जला जाना।
चन्द्रमती बस नाम तुम्हारा,
राधा बनकर गाने की।
मिला सुकून है तुमसे मुझको,
मैं राधा हूँ बरसाने की॥






