राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
मतलबी !
(कहानी)
राहुल शहर छोड़कर गाँव लौटा था। नौकरी छोड़ दी थी, क्योंकि शहर की भागमभाग और झूठे रिश्तों से थक चुका था। गाँव में घर, खेत और माँ-बाप थे। उसे लगा था कि यहाँ कम से कम लोग दिल से समझते होंगे।
पहले दिन गाँव वालों ने बड़े प्यार से पूछा, बेटा, शहर में क्या कर रहा था? कब तक रहेगा?राहुल ने बताया कि वह कुछ दिनों के लिए आया है, सोच-विचार कर रहा है कि आगे क्या करना है?
दूसरे दिन पड़ोसी रामू काका आए। मुस्कुराते हुए बोले, बेटा, तुम्हारे खेत की सीमा वाली जमीन थोड़ी विवादित है न? अगर तुम गाँव में बसने का फैसला करो, तो हम मिलकर निपटा लेंगे, राहुल ने कुछ नहीं कहा।
तीसरे दिन गाँव के सरपंच आए। चाय पीते हुए बोले, तुम पढ़े-लिखे हो। अगर गाँव में रहोगे तो पंचायत में मदद कर सकते हो। चुनाव भी आ रहे हैं। फिर मुस्कुराए, “बेशक, जो सही लगे वही करो।”
एक हफ्ते बाद माँ ने बताया कि गाँव की कई औरतें पूछ रही हैं कि राहुल की शादी कब होगी? किसी ने अपनी बेटी का नाम भी सुझा दिया था। राहुल चुपचाप सुनता रहा।
रात को वह खेत की मेड़ पर बैठा देखा, चाँद निकल रहा है। अचानक उसे याद आया,शहर में भी यही हुआ था। ऑफिस में बॉस उसकी मेहनत की तारीफ करते थे, जब तक प्रोजेक्ट उनका नाम चमकाने वाला होता। दोस्त मदद का हाथ बढ़ाते थे, जब तक उन्हें फायदा दिखता। रिश्तेदार खुश होते थे, जब तक कुछ माँगने का मौका न मिले।
अब गाँव में भी वही चेहरे थे। सिर्फ भाषा और कपड़े बदल गए थे। लोग समझते तो थे उसकी थकान, उसकी उलझन, उसकी वापसी का मतलब! लेकिन समझ का इस्तेमाल अपने हिसाब से कर रहे थे। किसी को जमीन चाहिए थी, किसी को वोट, किसी को रिश्ता बनाना है।
राहुल ने धीरे से मुस्कुरा दिया। अब गुस्सा नहीं था, न निराशा। बस एक साफ समझ थी कि लोग सच में सब समझते हैं।
बस अपने मतलब के हिसाब से।
उसने जेब से फोन निकाला और एक मैसेज लिखा खुद को
“अब से न उम्मीद रखूँगा कि कोई मुझे पूरी तरह समझेगा, और न नाराज होऊँगा जब कोई अपने फायदे से समझेगा, समझना मेरा काम है। मतलब निकालना उनका काम। बिल्कुल वैसे ही लेख लिखना लेखक का अपना काम है, पाठक जो भी मतलब निकाले ?
सुबह राहुल घर लौटा,माँ ने पूछा, “बेटा, क्या सोचा?” राहुल ने चाय का कप थामते हुए कहा, “माँ, अब मैं समझ गया हूँ लोग समझते हैं। बस…माँ मुस्कुराईं, उन्होंने भी समझ लिया था, अपने मतलब के हिसाब से नहीं बेटे की सोच / समझ के हिसाब से,,,







