डॉ.पी.यादव ‘ओज’
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
मैं बहुत भूखा हूं!
(लघुकथा)
रेल की पटरियों पर आती-जाती गाड़ियों की गड़गड़ाहट के बीच, रह-रह कर किसी के सिसकने की आवाज आसपास की वातावरण में घुल रही थी। बिजलियों की चमक और बादलों की शोर के बीच बारिश भी अपने शबाब पर थी।रात के लगभग 12:बज चुके थे। प्लेटफार्म पर इक्का-दुक्का यात्री ही नजर आ रहे थे। सभी शोरों के बीच प्लेटफार्म पर एक अजीब-सा सन्नाटा पसरा था। रेलवे के वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी ज्वाला सिंह अपनी ड्यूटी पर तैनात थे। अपने हाथ में एक छोटी-सी टॉर्च लिए, वह प्लेटफार्म के इधर-उधर गश्त लगा रहे थे।उनकी बेखौफ आंखों और शेर-सी चाल को देखकर ऐसा लग रहा था, जैसे कि वह किसी शिकार पर निकले हो। इसी बीच उनके कानो से किसी के सिसकने की आवाज आ टकराई।एकाएक वह हरकत में आ गए। आवाज की दिशा की ओर उनके कदम आगे बढ़ गए। पास ही एक टी-स्टाल थी। जिसके पीछे से किसी बच्चे के सिसकने की आवाज आ रही है। वहां कुछ अंधेरा था। उनकी टोर्च की सफेद-पीली चकमक रोशनी किसी के ढुलकते आंसुओं से जा टकराई। अचानक उनके कदम वहां रुक गए। पारखी आंखों ने कुछ जांचा-परखा। एक कड़कड़ाती आवाज बाहर उभरी।

कौन है, रे तू, यहां क्या कर रहा है? ज्वाला सिंह की रौबदार आवाज से लड़का सहन गया।सहमा-सा वह लड़का, अपनी सिसकियां को कुछ क्षण के लिए रोक लिया। डर और घबराहट में वह इधर-उधर देखने लगा।अचानक उस लड़के ने अपने दोनों हाथों से ज्वाला सिंह के पैरों को जोर से जकड़ लिया।वेदना की एक चीत्कार निकली।
साहब! मुझे मत मारना, मुझे मत मारना साहब। मैं बहुत भूखा हूं, साहब! मैंने दो दिन से कुछ खाया-पिया नहीं है, साहब! ज्वाला सिंह को मामला समझते देर ना लगी। उसकी रौब और वर्दी का लावा किसी मोम की भांति पिघल गया। उसने तुरंत चाय की दुकान से कुछ ब्रेड और सब्जी उस लड़के की ओर बढ़ाया। ब्रेड और सब्जी को देखकर उस लड़के ने ऐसा झपट्टा मारा, मानो वह कई दिनों से भूखा हो। लड़के को ऐसा करते देखा, ज्वाला सिंह की आँखें भर आईं। लड़का खाते-खाते कहने लगा मुझे मत मारना साहब! मुझे मत मारना।ज्वाला सिंह ने उसे ढाढस बंधाते हुए कहा, ठीक है ठीक है।अच्छा यह बताओ, तुम यहां कैसे पहुंचे,-ज्वाला सिंह ने कहा।साहब जी! कहीं आप मुझे सेठ जी को तो नहीं दे दोगे,-लड़के ने कहा। सेठ जी, कौन सेठ जी!,-ज्वाला सिंह ने जानना चाहा? साहब जी! वह सेट बहुत बुरा आदमी है। दुकान पर काम भी करवाता है और खाना भी नहीं देता है। बीते दो दिन पहले मुझे, उसने बहुत मारा और खाने को भी नहीं दिया।वह लड़का सेठ के बारे में बताते हुए कांप-सा गया। लड़के के सर पर हाथ रखते हुए ज्वाला सिंह ने कहा,-ठीक है, कल तुम मेरे साथ सेठ की दुकान चलना। मैं उसे सबक सिखाऊंगा। दूसरे ही सुबह ज्वाला सिंह लड़के के साथ सेठ की दुकान के सामने जा धमके। वह लड़के को कुछ आगे करते हुए दुकान की ओट में छुप गए। सेठ, लड़के को अपने सामने देख आग-बबूला हो गया। क्यों रे भगोड़े, कहां चंपत हो गया था? बिना काम किए मेरी मेहनत की कमाई की रोटी तोड़ेगा?..आज तुझे मजा चखाता हूं। सेठ जैसे ही उस लड़के की ओर बढ़ा, ज्वाला सिंह उसके सामने आ डटे। अपने सामने किसी वर्दीधारी को देखकर, सेठ हक्का-बक्का रह गया। मानो, उस को सांप सूंघ गया हो। ज्वाला सिंह ने कड़कते स्वर में कहा,-अच्छा! तो वह सेठ तुम ही, जो छोटे गरीब बच्चों को बाल मजदूरी के जाल में फसता है, और फिर उनकी मजदूरी न देकर उन्हें भूखा भी रखता है? सेठ जी की बोलती बंद हो गई। वह इधर-उधर बगले झांकने लगा। उसका दिमाग काम करना बंद कर दिया था। ज्वाला सिंह ने सेठ को धड़काते हुए कहा,-बाल- मजदूरी कानूनन जुर्म है। तुम्हें इसकी गंभीर सजा मिल सकती है। सेठ, ज्वाला सिंह के आगे हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगा। मुझे माफ कर दो साहब! मैं अब कभी जिंदगी में ऐसी भूल नहीं करूंगा। सेठ की इस दुर्दशा को देखकर, लड़के की आंखों में एक नई चमक आ गई। देखते ही देखते दुकान के भीतर काम करने वाले सात-आठ अन्य बच्चे भी वहां आ खड़े हुए, जो उस सेठ के यहां बाल-मजदूरी के शिकार थे। ज्वाला सिंह को देखकर सबकी आंखों में उम्मीद की एक किरण जागी। सेठ को अपने किए पर पछतावा हो रहा था।ज्वाला सिंह ने सेठ को चेतावनी देते हुए कहा,-यदि ऐसे बाल मजदूरी करवाते हुए दोबारा तुम पकड़े गए तो फिर जेल की हवा खाना। सभी बच्चों के चेहरे पर एक अजीब-सी मुस्कान थी।ज्वाला सिंह उन बच्चों को उनके नए सपनों के साथ, उनके माता-पिता को सौंप देता है। इस तरह बच्चे बाल-मजदूरी की बेड़ी से हर समय के लिए आजाद हो जाते हैं।







