कवयित्री चन्द्रमती चतुर्वेदी
‘चन्दू’
बस्ती, अयोध्या धाम
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
पावक दहति हृदय में अतिशय,
अँखियाँ नीर बहाती हैं।
हाय रे मन की पीर पुरानी,
साँस-साँस सुलगाती है।
पावक दहति हृदय में अतिशय,
अँखियाँ नीर बहाती हैं॥
यादों की बदली घिर-घिर आती,
मन में हूक जगाती है,
सूनी-सूनी रातें मेरी,
तेरी याद सताती हैं।
टूटे सपनों की किरचें भी,
मन को खूब चुभाती हैं,
पावक दहति हृदय में अतिशय,
अँखियाँ नीर बहाती हैं॥
जिसको अपना मान लिया था,
वही दूर हो जाता है,
मन का सारा दर्द छिपाकर,
मुख मुस्काता जाता है।
भीतर-भीतर जलता मन यह,
किसको व्यथा सुनाती है,
पावक दहति हृदय में अतिशय,
अँखियाँ नीर बहाती हैं॥
कभी मिलन की आस जगाती,
कभी विरह बढ़ाती है,
एक तुम्हारी याद ही तो,
जीना मुझे सिखाती है।
दर्द बना जब गीत हृदय का,
आँख स्वयं भर आती है,
पावक दहति हृदय में अतिशय,
अँखियाँ नीर बहाती हैं॥
अब तो मेरी साँसों में भी,
तेरी ही आहट रहती,
मन के सूने आँगन में बस,
तेरीकड स्मृति आकर रहती।
चन्द्रमती के गीतों में भी,
मन की पीर समाती है,
पावक दहति हृदय में अतिशय,
अँखियाँ नीर बहाती हैं॥
***************
अग्नि हृदय में भई प्रज्वलित
अग्नि हृदय में भई प्रज्वलित,
जाग उठा स्वाभिमान है,
अन्यायों से टकराने का,
अब मन में तूफान है।
कब तक सहते रहेंगे हम,
कब तक होगा वार है,
जागो अपने हक के खातिर,
यही समय की पुकार है।
आँखों में अंगार जल रहे,
सीने में हुंकार है,
सत्य-धर्म की रक्षा करना,
अपना परम विचार है।
लाख बिछा लो काँटे पथ में,
हमको नहीं ठहरना है,
आँधी हो या घोर तिमिर हो,
लक्ष्य तलक बढ़ना है।
राख तले दबी हुई चिंगारी,
ज्वाला बनकर जागेगी,
झूठ और अत्याचारों की,
नींव हिलाकर भागेगी।
नारी को कमजोर समझना,
भारी भूल तुम्हारी है,
जिसने जग को जन्म दिया है,
शक्ति वही चिंगारी है।
सीता का धीरज भी हममें,
दुर्गा का हुंकार है,
मीरा जैसी भक्ति हृदय में,
लक्ष्मीबाई की तलवार है।
अब न किसी के छल के आगे,
झुकने को तैयार हैं,
अपने हक और मान-सम्मान पर,
हम पहरेदार हैं।
कर्म हमारा धर्म बनेगा,
सत्य हमारा मान है,
मानवता की रक्षा करना,
अपना स्वाभिमान है।
अग्नि हृदय में भई प्रज्वलित,
अब चुप रहना पाप है,
अन्यायों के अंत की खातिर,
उठना ही प्रताप है।
सुन लो दुनिया के रखवालो,
नारी अब लाचार नहीं,
चन्द्रमती की कलम उठी है,
अत्याचार स्वीकार नहीं!







