मध्यप्रदेश में ओबीसी आरक्षण पर भाजपा-कांग्रेस की सियासी परीक्षा।

Spread the love

 

पवन वर्मा

 

                   (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

     मध्यप्रदेश में ओबीसी आरक्षण पर भाजपा-कांग्रेस

                     की सियासी परीक्षा।

 

 

 

राजनीति में किसी वर्ग के हितों की पैरवी करना आसान है, लेकिन उसके अधिकारों को संवैधानिक कसौटी पर सुरक्षित रखना असली परीक्षा है। मध्यप्रदेश में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण का विवाद भाजपा और कांग्रेस को इसी परीक्षा के सामने खड़ा कर रहा है। कांग्रेस ने सत्ता में रहते हुए अन्य पिछड़ा वर्ग का आरक्षण 14 से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किया था। अब हाईकोर्ट ने इस व्यवस्था को असंवैधानिक ठहरा दिया है। कांग्रेस इसके लिए भाजपा सरकार की कमजोर पैरवी को जिम्मेदार बता रही है, जबकि भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस ने राजनीतिक लाभ की जल्दबाजी में कानून बनाया और उसे पर्याप्त संवैधानिक आधार नहीं दिया।

            दोनों दल ओबीसी समाज के अधिकारों की रक्षा का दावा कर रहे हैं। लेकिन इस राजनीतिक लड़ाई का एक दूसरा पहलू भी है। आरक्षण को लेकर ओबीसी वर्ग की अपेक्षाओं के साथ अनारक्षित वर्ग के युवाओं के अवसर और नियुक्तियां भी जुड़े हैं। एक तरफ आरक्षण बढ़ाने की मांग है, तो दूसरी तरफ अवसरों के बंटवारे और लंबित भर्तियों को लेकर चिंता। ऐसे में भाजपा और कांग्रेस की परीक्षा केवल ओबीसी समाज के बीच अपनी विश्वसनीयता साबित करने की नहीं, बल्कि संवैधानिक व्यवस्था के भीतर ऐसा समाधान तलाशने की भी है, जिससे किसी वर्ग में अन्याय की भावना गहरी न हो।

            वर्ष 2019 में तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने ओबीसी आरक्षण 14 से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का फैसला किया था। इसके बाद इसकी संवैधानिक वैधता अदालत में चुनौती के घेरे में आ गई। करीब सात साल चले विवाद के बाद हाईकोर्ट ने 27 प्रतिशत आरक्षण संबंधी अध्यादेश और संशोधन कानून को असंवैधानिक ठहराते हुए निरस्त कर दिया। अदालत ने लोक सेवाओं और उच्च शिक्षा में ओबीसी आरक्षण 14 प्रतिशत रखने के निर्देश दिए। साथ ही भर्ती प्रक्रियाओं में रोके गए 13 प्रतिशत पदों पर अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को तीन महीने के भीतर नियुक्ति देने को कहा। पहले से हो चुकी नियुक्तियों को वैध माना गया है।

             हाईकोर्ट ने अपने फैसले में आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा और सुप्रीम कोर्ट के इंद्रा साहनी तथा जयश्री लक्ष्मणराव पाटिल मामलों में स्थापित सिद्धांतों का उल्लेख किया। अदालत के अनुसार, निर्धारित सीमा से आगे जाने के लिए असाधारण परिस्थितियों का पर्याप्त संवैधानिक आधार प्रस्तुत करना जरूरी है, जो इस मामले में स्थापित नहीं हो सका। यानी विवाद ओबीसी को आरक्षण देने की जरूरत से अधिक, उसे 14 से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने के कानूनी आधार का था। लेकिन इस कानूनी फैसले ने प्रदेश में राजनीतिक जवाबदेही का सवाल खड़ा कर दिया है।

           कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने फैसले के लिए भाजपा सरकार की कमजोर पैरवी को जिम्मेदार ठहराया है। उनका आरोप है कि ओबीसी वर्ग के सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन से जुड़े पर्याप्त तथ्य अदालत के सामने प्रभावी ढंग से नहीं रखे गए। पटवारी ने सरकार से पूछा है कि आरक्षण की रक्षा के लिए कौन-से आंकड़े प्रस्तुत किए गए और कानूनी पक्ष मजबूत करने के लिए क्या प्रयास हुए। उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और वर्तमान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं।

           कांग्रेस ने मांग की है कि राज्य सरकार हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ तत्काल सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर करे, अनुभवी अधिवक्ताओं की टीम के साथ पैरवी करे और विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर अपनी कार्ययोजना सामने रखे। पटवारी ने जातिगत जनगणना की मांग भी उठाई है, ताकि सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के प्रमाणिक आंकड़ों के आधार पर आरक्षण का पक्ष मजबूत किया जा सके। उनका कहना है कि कांग्रेस ओबीसी वर्ग के अधिकारों की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक लड़ेगी और 2028 में सत्ता में आने पर आरक्षण बहाल करने के लिए आवश्यक कदम उठाएगी।

                   कांग्रेस की दलील है कि उसकी सरकार ने सामाजिक न्याय की मंशा से आरक्षण बढ़ाने का कानून बनाया था और भाजपा सरकार की जिम्मेदारी थी कि वह उसे अदालत में प्रभावी ढंग से बचाती। लेकिन इस दलील के सामने एक सवाल कांग्रेस पर भी उठता है कि यदि कानून का उद्देश्य पिछड़े वर्ग को अधिक अवसर देना था, तो उसे संवैधानिक कसौटी पर टिकाने के लिए जरूरी तैयारी कितनी की गई थी? हाईकोर्ट ने अपने फैसले में वर्ष 2019 के अध्यादेश को पर्याप्त तैयारी के अभाव और अनुचित जल्दबाजी में पारित किए जाने का उल्लेख किया है। भाजपा इसी टिप्पणी को कांग्रेस के खिलाफ अपने सबसे मजबूत तर्क के रूप में पेश कर रही है।

      भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खण्डेलवाल का कहना है कि कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव से पहले राजनीतिक लाभ लेने की जल्दबाजी में आरक्षण बढ़ाने का अध्यादेश जारी किया, लेकिन उसे मजबूत संवैधानिक और कानूनी आधार देने में चूक की। उनके मुताबिक, कांग्रेस अब अपनी सरकार की गलतियों की जिम्मेदारी लेने के बजाय भाजपा पर आरोप लगाकर जनता को गुमराह कर रही है। खण्डेलवाल ने कहा है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में भाजपा सरकार ओबीसी वर्ग के सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक सशक्तिकरण के लिए प्रतिबद्ध है। सरकार हाईकोर्ट के निर्णय का अध्ययन कर आगे की रणनीति तय करेगी और 27 प्रतिशत आरक्षण के संकल्प को पूरा करने के लिए आवश्यक कानूनी विकल्पों पर विचार करेगी।

          भाजपा के तर्क में कांग्रेस सरकार की कानूनी चूक का सवाल प्रमुख है, लेकिन इससे मौजूदा सरकार की जवाबदेही समाप्त नहीं होती। आरक्षण का विवाद वर्षों से अदालत में था और इस दौरान भर्ती प्रक्रियाओं में पदों का एक हिस्सा रोका गया। अब हाईकोर्ट ने 13 प्रतिशत पदों पर अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों की नियुक्ति का निर्देश दिया है, जिससे लंबे समय से इंतजार कर रहे युवाओं को राहत मिलने का रास्ता खुला है। लेकिन 27 प्रतिशत आरक्षण का भविष्य अभी कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर है। भाजपा को यह स्पष्ट करना होगा कि वह अपने घोषित संकल्प को संवैधानिक रूप से संभव बनाने के लिए क्या रास्ता अपनाना चाहती है।

                इस पूरे विवाद में अनारक्षित वर्ग की चिंता को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आरक्षण की व्यवस्था और भर्ती प्रक्रियाओं में लंबे समय तक बनी अनिश्चितता ने विभिन्न वर्गों के अभ्यर्थियों को प्रभावित किया है। ओबीसी समाज अपने हिस्से के अवसर और प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल कर रहा है, तो अनारक्षित वर्ग के युवाओं की अपेक्षा है कि नियुक्तियों में उनके अधिकारों और अवसरों की निष्पक्ष रक्षा हो। यदि किसी वर्ग को यह महसूस होता है कि उसके साथ अन्याय हुआ है, तो असंतोष स्वाभाविक है। इसलिए राजनीतिक दलों के लिए चुनौती किसी एक वर्ग की चिंता को दूसरे के विरुद्ध खड़ा करना नहीं, बल्कि संविधान के दायरे में न्यायसंगत समाधान तलाशना है।

           यहीं आरक्षण की राजनीति और सामाजिक न्याय की वास्तविक जरूरत के बीच अंतर स्पष्ट होता है। राजनीतिक दल चुनावी मंचों पर अपने दावों को जोरदार तरीके से रख सकते हैं, लेकिन अदालत में कानून को टिकाने के लिए ठोस तथ्य और संवैधानिक आधार चाहिए। केवल आरक्षण बढ़ाने की घोषणा या दूसरे दल पर कमजोर पैरवी का आरोप, दोनों में से कोई भी अपने आप में समाधान नहीं है। असली सवाल यह है कि कानूनी अनिश्चितता कैसे दूर होगी और भर्ती प्रक्रिया में लगे युवाओं को कब तक स्पष्टता मिलेगी।

            वर्ष 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले ओबीसी आरक्षण का मुद्दा मध्यप्रदेश की राजनीति में बड़ा स्थान हासिल कर सकता है। कांग्रेस इसे भाजपा सरकार की नाकामी के रूप में पेश करेगी, जबकि भाजपा कमलनाथ सरकार की जल्दबाजी और कानूनी खामियों को सामने रखेगी। दोनों दल ओबीसी समाज के बीच अपनी प्रतिबद्धता साबित करने की कोशिश करेंगे। लेकिन मतदाताओं के सामने केवल यह सवाल नहीं होगा कि गलती किसकी थी। वे यह भी देखेंगे कि विवाद के समाधान के लिए किसने प्रभावी पहल की और युवाओं के भविष्य को अनिश्चितता से निकालने में किसकी भूमिका रही।

               अब सुप्रीम कोर्ट इस लड़ाई का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव है। कांग्रेस वहां जाने की घोषणा कर चुकी है और भाजपा सरकार भी कानूनी विकल्पों पर विचार कर रही है। हालांकि, अदालत में अपील करना और 27 प्रतिशत आरक्षण के पक्ष में ऐसा संवैधानिक आधार प्रस्तुत करना, जो न्यायिक कसौटी पर टिक सके, अलग-अलग बातें हैं। अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया से होगा, लेकिन राजनीतिक दलों की विश्वसनीयता उनके प्रयासों और परिणामों से तय होगी।

             मध्यप्रदेश में ओबीसी आरक्षण की कसौटी पर भाजपा और कांग्रेस दोनों खड़े हैं। कांग्रेस को अपने बनाए कानून की कानूनी मजबूती पर उठे सवालों का जवाब देना है, तो भाजपा को अपने संकल्प को परिणाम तक पहुंचाने की क्षमता साबित करनी है। साथ ही, दोनों दलों को यह समझना होगा कि सामाजिक न्याय की बहस में ओबीसी और अनारक्षित वर्ग के युवाओं की चिंताओं को एक-दूसरे का विरोधी बनाकर नहीं देखा जा सकता।

       आखिरकार, आरक्षण की इस लड़ाई में राजनीतिक जीत का दावा करना आसान है, लेकिन ऐसा संवैधानिक समाधान निकालना कठिन, जो अधिकारों की रक्षा करे, भर्ती प्रक्रिया की अनिश्चितता दूर करे और विभिन्न वर्गों का भरोसा बनाए रखे। सुप्रीम कोर्ट में अगली लड़ाई इसी दिशा में निर्णायक होगी। भाजपा और कांग्रेस के लिए असली परीक्षा एक-दूसरे को गलत साबित करना नहीं, बल्कि अपने दावों को ठोस कार्रवाई में बदलना है।

                   (विनायक फीचर्स)

  • Related Posts

    विश्व कविता  अडिंक्रा

    Spread the love

    Spread the love  विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ (पूर्व मुख्य अभियंता) (लंदन प्रवास पर)                 (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)     विश्व कविता    अडिंक्रा  …

    संकल्प और सेवाभाव के साथ राष्ट्र निर्माण में संलग्न प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।

    Spread the love

    Spread the love    गोविन्द सिंह राजपूत (लेखक मप्र सरकार में खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री हैं।)                       …

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    You Missed

    विश्व कविता  अडिंक्रा

    • By User
    • October 12, 2026
    • 4 views
    विश्व कविता      अडिंक्रा

    चुनाव व्यवस्था में व्यापक बदलाव के बिना लोकतंत्र का भविष्य अंधकारमय पीसी तिवारी।

    • By User
    • October 12, 2026
    • 11 views
    चुनाव व्यवस्था में व्यापक बदलाव के बिना लोकतंत्र का भविष्य अंधकारमय पीसी तिवारी।

    सेवा संकल्प अभियान के तहत लमगड़ा में आयोजित बहुउद्देशीय शिविर में 516 लोगों ने किया प्रतिभाग।

    • By User
    • October 12, 2026
    • 9 views
    सेवा संकल्प अभियान के तहत लमगड़ा में आयोजित बहुउद्देशीय शिविर में 516 लोगों ने किया प्रतिभाग।

    संकल्प और सेवाभाव के साथ राष्ट्र निर्माण में संलग्न प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।

    • By User
    • October 12, 2026
    • 11 views
    संकल्प और सेवाभाव के साथ राष्ट्र निर्माण में संलग्न प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।

    शब्द, भाव और विचार

    • By User
    • October 12, 2026
    • 8 views
    शब्द, भाव और विचार

    अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस के अवसर पर विक्टर मोहन जोशी राजकीय इंटर कालेज एन टी डी में विधिक जागरूकता शिविर का किया गया आयोजन।

    • By User
    • October 12, 2026
    • 11 views
    अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस के अवसर पर विक्टर मोहन जोशी राजकीय इंटर कालेज एन टी डी में विधिक जागरूकता शिविर का किया गया आयोजन।