प्रा.डॉ. शंकर घनशामदास अंदानी
(आचार्य, सी ए.)
अहिल्या नगर, महाराष्ट्र
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w)6395080071
माँ के पूजन के साथ नारी सम्मान का भी लें संकल्प।
नवरात्रि केवल माँ दुर्गा की आराधना, पूजा-पाठ और उपवास का पर्व नहीं है, बल्कि यह नारी शक्ति, ममता, साहस, त्याग और आत्मसम्मान को पहचानने का पावन अवसर भी है। माँ दुर्गा के नौ स्वरूप हमें जीवन में शक्ति, धैर्य, करुणा, ज्ञान और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा देते हैं। ऐसे में माँ की पूजा तभी सार्थक होगी, जब हम प्रत्येक स्त्री का सम्मान करने का संकल्प भी लें।
जिस घर में नारी का सम्मान होता है, उसी घर में संस्कार, प्रेम और खुशहाली का वास्तविक वास होता है। माँ, बहन, बेटी, पत्नी, सहकर्मी या समाज की किसी भी महिला के प्रति सम्मान का भाव रखना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। नारी केवल परिवार की आधारशिला ही नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। वह अपने परिश्रम, बुद्धिमत्ता, संवेदनशीलता और साहस से हर क्षेत्र में नई ऊँचाइयाँ प्राप्त कर रही है।
विडंबना यह है कि एक ओर हम देवी की प्रतिमा के सामने सिर झुकाते हैं, वहीं दूसरी ओर अनेक महिलाओं को भेदभाव, अपमान, हिंसा और असमान अवसरों का सामना करना पड़ता है। यह विरोधाभास हमें आत्मचिंतन करने के लिए प्रेरित करता है। यदि हम वास्तव में माँ दुर्गा के उपासक हैं, तो हमें अपने व्यवहार में भी उनके आदर्शों को अपनाना चाहिए।
नारी सम्मान की शुरुआत अपने घर से होती है। बेटा और बेटी में समानता रखना, महिलाओं की शिक्षा को प्रोत्साहित करना, उनकी स्वतंत्रता और निर्णयों का सम्मान करना तथा उनके साथ होने वाले अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना हमारे कर्तव्य हैं। किसी महिला का मजाक उड़ाना, उसे कमजोर समझना या उसकी गरिमा को ठेस पहुँचाना कभी भी स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
आइए, इस नवरात्रि में हम केवल दीप प्रज्वलित न करें, बल्कि अपने विचारों में भी सम्मान का प्रकाश जगाएँ। माँ के चरणों में शीश झुकाते हुए संकल्प लें कि हम हर स्त्री को सम्मान, सुरक्षा, समान अवसर और गरिमापूर्ण जीवन देने के लिए सदैव प्रयासरत रहेंगे।
याद रखें—माँ की सच्ची पूजा मंदिर में फूल चढ़ाने के साथ-साथ हर नारी के सम्मान की रक्षा करने में भी है। नारी का सम्मान हमारा संस्कार, हमारा धर्म और हमारा कर्तव्य है।






