डॉ. दीपक गोस्वामी
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w) 6395080071
कैमरा और भीड़ नहीं, आचरण और करुणा है
सच्चे साधु की पहचान।
साधु कैसा चाहिए? यह प्रश्न जितना सरल दिखाई देता है, उतना ही भीतर तक उतरने वाला है। वास्तव में सच्चे साधु की खोज बाहर से शुरू नहीं होती, भीतर से शुरू होती है। जब मन संसार के शोर से थक जाता है, जब भीड़ के बीच भी अकेलापन घेर लेता है, जब धन, प्रतिष्ठा और प्रदर्शन के बीच शांति दिखाई नहीं देती, तब मन पूछता है कि आखिर साधु कैसा हो?
साधु केवल वस्त्र से नहीं पहचाना जाता, उसके व्यवहार से पहचाना जाता है। केवल जटाएँ, दाढ़ी, माला, चिह्न या आसन किसी को साधु नहीं बनाते। साधु वह है जिसने अपने भीतर के असंतुलन को साध लिया हो। जिसने इच्छाओं को अपना स्वामी नहीं, साधन बना लिया हो। जिसका जीवन स्वयं उसके उपदेश का प्रमाण हो।
सच्चा साधु अकिंचन होना जानता है। अकिंचन का अर्थ केवल निर्धन होना नहीं, बल्कि भीतर से संग्रह के अहंकार से मुक्त होना है। जिसके लिए वस्तुएँ उपयोग की हैं, पहचान की नहीं। धन उसके पास आए तो सेवा में लगे, सम्मान मिले तो विनम्रता बढ़े और सुविधा मिले तो उसका उपयोग दूसरों के लिए हो। जिसके पास बहुत है, वह भी अकिंचन हो सकता है, यदि उसके भीतर किसी वस्तु का अहंकार न हो।
सच्चा साधु त्याग को प्रदर्शन नहीं बनाता। वह यह सिद्ध करने के लिए त्याग नहीं करता कि उसने कितना छोड़ा है। उसके लिए त्याग सहजता है। जैसे वृक्ष फल देकर हिसाब नहीं रखता, नदी जल देकर नाम नहीं पूछती और सूर्य प्रकाश देकर प्रतिफल नहीं माँगता, वैसे ही साधु का जीवन देने में प्रसन्न होता है।
उसकी सबसे बड़ी पहचान उसका स्थिर मन है। परिस्थितियाँ बदलें, लोग बदलें, प्रशंसा मिले या निंदा उसका भीतर विचलित न हो। श्रीमद्भगवद्गीता स्थिरबुद्धि मनुष्य की पहचान समत्व से करती है। साधु का मन संसार से भागकर स्थिर नहीं होता। संसार के बीच रहते हुए भी अपने केंद्र से न हटे, यही उसकी साधना है।
वह कर्म से दूर नहीं भागता। गाय की सेवा करना, किसी भूखे को भोजन देना, किसी रोगी की सहायता करना, वृक्ष लगाना, आश्रम साफ करना, किसी दुखी व्यक्ति की बात सुन लेना,ये सब उसके लिए भजन हैं। भजन केवल माला फेरने का नाम नहीं,जब कर्म में करुणा उतरती है और सेवा में अहंकार समाप्त होता है, तब कर्म भी साधना बन जाता है।
सच्चे साधु की वाणी भी उसकी पहचान होती है। सत्य बोलना आवश्यक है, पर सत्य को चोट बनाकर बोलना साधुता नहीं। वाणी में सत्य के साथ करुणा होनी चाहिए। वह व्यक्ति को तोड़ने के लिए नहीं, जगाने के लिए बोलता है। उसकी बात कभी कठोर भी हो सकती है, पर उसमें द्वेष नहीं होता। वह शोर नहीं करता, क्योंकि जिसे अपने सत्य पर विश्वास होता है, उसे अपनी आवाज ऊँची करने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
उसकी दृष्टि सबसे अलग होती है। संसार मनुष्य को उसकी हैसियत, पद, धन और प्रसिद्धि से देखता है। साधु उसके भीतर छिपे मनुष्य को देखता है। वह पूछने से पहले समझता है और निर्णय देने से पहले सुनता है। उसके पास बैठकर यदि किसी रोते हुए मनुष्य को यह अनुभव हो जाए कि कोई उसे बिना स्वार्थ समझ रहा है, तो यही उसकी साधुता का प्रमाण है।
साधु का एकांत भी सार्थक होता है। एकांत का अर्थ लोगों से घृणा करना नहीं, बल्कि स्वयं से मिलने की क्षमता प्राप्त करना है। जो व्यक्ति कुछ समय बिना शोर, बिना प्रदर्शन और बिना बाहरी सहारे के अपने भीतर बैठ सकता है, वही अपने मन को पहचान सकता है। सच्चा साधु भीड़ से भागता नहीं, पर भीड़ पर निर्भर भी नहीं रहता। उसका भीतर इतना भरा होता है कि अकेलापन उसे खाली नहीं करता। उसका आहार-विहार भी संयमित होता है। आवश्यकता और लालसा के बीच का अंतर समझना साधना है। भोजन शरीर के लिए हो, प्रदर्शन या अतिभोग के लिए नहीं। विश्राम शरीर को मिले, आलस्य को नहीं। संयम जीवन को सूखा नहीं बनाता वह जीवन में स्पष्टता लाता है।
धन के प्रति उसका संबंध भी परीक्षा की कसौटी है। धन साधु के हाथ में पहुँचे तो सेवा का माध्यम बने, निजी साम्राज्य का आधार नहीं। दान यदि करुणा तक पहुँचता है तो पवित्र है। यदि दान के साथ अहंकार, भय, नियंत्रण और व्यक्तिगत लाभ जुड़ जाएँ तो उसका आध्यात्मिक मूल्य घट जाता है। साधु संग्रह का स्वामी नहीं, संसाधनों का सेवक होता है।
और उसकी सबसे कठिन परीक्षा अपमान में होती है। सम्मान मिलने पर विनम्र दिखना सरल है, अपमान मिलने पर संतुलित रहना कठिन। जो आलोचना सुनकर आत्मपरीक्षण कर सके, प्रतिरोध आवश्यक हो तो भी द्वेष न रखे और अपने सम्मान की रक्षा को जीवन का लक्ष्य न बना ले, उसमें साधुता की झलक दिखाई देती है।
सच्चे साधु की पहचान यह भी है कि उसके पास जाकर व्यक्ति उसके प्रति अस्वस्थ निर्भरता में न फँसे। वह अपने अनुयायियों को अपना दास नहीं बनाता,उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करता है। वह कहता है मुझमें मत अटकना, उस सत्य तक पहुँचना जिसकी ओर मैं संकेत कर रहा हूँ। वह व्यक्ति को अपने भीतर का दीपक जलाना सिखाता है।
आज साधु की पहचान कैमरों, भीड़, चमत्कारों, प्रचार और बाहरी वैभव से नहीं होनी चाहिए। प्रश्न यह होना चाहिए कि उसके निकट जाकर क्या मन शांत होता है? क्या सेवा की प्रेरणा बढ़ती है? क्या लोभ घटता है? क्या अहंकार पिघलता है? क्या परिवार, समाज, प्रकृति और प्राणीमात्र के प्रति करुणा बढ़ती है? यदि हाँ, तो वहाँ साधुता की सुगंध अवश्य है।
साधु कैसा चाहिए? ऐसा साधु चाहिए जिसके वस्त्र से पहले उसका चरित्र दिखाई दे, जिसकी वाणी से पहले उसका आचरण बोले, जिसके पास बैठने से भय घटे और विवेक जागे जो स्वयं को बड़ा सिद्ध करने के बजाय सामने वाले के भीतर छिपे प्रकाश को जगा दे।
ऐसा साधु बाजार में खोजने से नहीं मिलेगा। उसके लिए अपनी दृष्टि शुद्ध करनी होगी। क्योंकि अंततः सच्चे साधु की पहचान केवल उसके रूप से नहीं, उसके स्पर्श से होती है।वह तुम्हें अपने पीछे चलने के लिए नहीं, अपने भीतर जागने के लिए प्रेरित करता है।
(विनायक फीचर्स)






