सुश्री सरोज कंसारी कवयित्री/लेखिका/शिक्षिका नवापारा/राजिम रायपुर, (छत्तीसगढ़)
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w) 6395080071
आलेख
“”””””””””
जब अपने अधिकार के लिए लड़ती हैं तब साक्षात
चंडी और काली होती हैं नारी।
दुख की घड़ी में नारी जिस शक्ति का प्रयोग करती हैं,
उस समय वह साक्षात माँ दुर्गा होती हैं।
शक्ती- साहस और धैर्य की देवी हैं नारी।
———————————————-
धरा पर धीर सी हैं, नारी सृष्टि की श्रृंगार हैं। भारतीय सभ्यता और संस्कृति में सदा ही नारी को पूज्यनीय माना गया हैं। हर रूप में समर्पण। और लगन से श्रेष्ठ प्रदर्शन कर उच्च स्थान प्राप्त हैं। अपनी कोख में नौ माह बच्चे को सहेजकर रखती हैं, उसे पल्लवित व पुष्पित करती हैं। प्रलय की गोद मे बैठकर भी सृजन करती हैं,अंधकार से अबोध मन को निकालकर रोशनी से युक्त दुनिया से परिचय कराती हैं। असीम शक्ति से भरपूर ऊर्जावान होती हैं, नारी तभी वो देवी का अवतार कहलाती हैं माँ बच्चो को व्यवहारिक ज्ञान देती हैं, संस्कारित करके घर के ही दायरे से निकलने के लिए उसे प्रेरित करती हैं। बाहर की दुनिया से भी अवगत कराती हैं, शिक्षा जगत का सार समझाती हैं तब वह ज्ञान की देवी माँ शारदा के रूप में होती हैं। असंख्य कष्टों को सहन कर समर्पण के पथ पर चलती हैं, त्याग-तपस्या के बल पर परिवार के हर सदस्यों की जरूरतों को पूरा करती हैं। सुबह से उठकर निरंतर काम ही करती हैं और रातो में बच्चों को मीठी सी लोरी सुनाकर सुलाती हैंबदले में कुछ नही चाहती, परिवार की खुशी के लिए हर संभव प्रयास भी करती हैं।
दुख की घड़ी में हर असंभव को संभव बनाने के लिए जिस शक्ति का प्रयोग करती हैंउस समय वह साक्षात माँ दुर्गा होती हैं। पाई-पाई जोड़कर रखती हैं, खुद भूखी रहकर भी सभी की भूख मिटाती हैं, अपने सदाचरण से घर में सुख-समृद्धि लाती हैं तब अन्नपूर्णा की देवी माँ लक्ष्मी कहलाती हैं। जब अधिकारों के लिए वह लड़ती है, दुष्ट-पापी और दुराचार, वहसी दरिंदो से अपनी आबरू की रक्षा करती तब वह अपने रौद्र रूप चंडी व काली का दिखाती हैं। नारी ही नारायणी हैं, जो समय व परिस्थिति के अनुसार हर रंग में घुल मिल जाती हैं। साहस व सूझबूझ से कार्य करती हैं, जिसके बिना इस सुंदर जहान की कल्पना नहीं कर सकते, देवी के रूप में वह परिभाषित हैं।
आज भी नारी अपने वजूद के लिए दर-दर भटकती हैं अपने स्वाभिमान को तब भी आंच नहीं आने देती। महान ग्रथों और वेद-पुराणों में भी नारी को वंदनीय ही कहा गया हैं। गौर से कभी देखे तो समझेंगे की- सिसकती है,रूठती हैं, बिखरती हैं, टूटती हैं रूंदन होता हैं सांसो में, प्रश्रचिन्ह होता हैं एहसासों में। घुटन भी होता हैं उसे भी व्यक्त नहीं कर पाती अपनी व्यथा कभी। घर- परिवार, पड़ोस और समाज के दायरे में संदेह के घेरे में होती हैं। दोनो कुलों की लाज रखती हैं, प्रीत-पराई अपनाती हैं, सवाल का सटीक जवाब देती हैं। इस पुरुष-प्रधान देश में सदा ही वो कमजोर कहलाई हैं। अपनी हर एक चाहतों को दिल में दफन करती हैं हर वक्त क्यों कैसे कहाँ ? जैसी छोटी मानसिकता के लोगो का सामना करती हैं। दोहरे जिम्मेदारियों को निभाते हुए घर और बाहर की दुनिया में भी वो संतुलन रखती हैं। जब हद से बाहर हो जाये बंदिशें तब लांघ वो जाती हैं लक्ष्मण रेखा। रावण की लंका जलाने के लिए आतुर हो जाती हैं। सब्र का इम्तिहान हर पल हर मोड़ में होता हैं वह रुकती नहीं औऱ थकती नहीं चलती हैं अनवरत अपनी राह। आज नारी किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं पुरूष प्रधान इस देश में कदम से कदम मिला कर चल रही हैं। पुलिस डॉक्टर, इंजीनियर, जज, इंजीनियर व पायलेट बनकर हौसलों की उड़ान भर रही हैं। नवरात्र में शक्ति के ही नौ रूपो की पूजा की जाती हैं, श्रद्धा, आस्था व धर्म की ज्योत जलाई जाती है। नारी करुणा- ममता, स्नेह व प्यार की मूरत हैं। जिस जगह भक्ति और पवित्रता का मिलन होता हैं वही मातारानी का आशीर्वाद होता हैं। लोभ- क्रोध, मद-माया से युक्त जीवन पशु तुल्य होता हैं। मातारानी के जगराते में सेवा संयम- सौम्यता और सहयोग का सौभाग्य प्राप्त होता हैं जो हमारे मन में सद्कार्य के भाव विकसित करते है।
अष्टमी के दिन कन्या पूजन किया जाता हैं, ऐसी मान्यता हैं कि मां नौ दुर्गा इन कन्याओं के रूप में साक्षात इस धरती पर विराजमान होती हैं। बहुत ही सुंदर सोच है, बेटी माता की रूप होती हैं कई बार देखा गया हैं की अष्टमी के दिन छोटी बेटियों को ढूंढते फिरते है कमी हो जाती हैं, पूजन के लिए बेटियों की। मन में विचार आता हैं- वे लोग कौन होते है जो बेटे की चाह में बेटियों को इस दुनिया में आने नहीं देना चाहते। दहेज की बलिवेदी पर चढ़ा देते हैं, शिक्षा -संपत्ति के बंटवारे पालन-पोषण में भेदभाव करते हैं। अखबारों में खून से लथपथ बेटी के शव कही जंगल व झाड़ी, सुनसान सड़को पर पड़ी होती हैं। कारण हवस के वहसी दरिंदो ने ही नोच डाली मासूम की जिस्म ये खबर रोज पढ़ने को मिलते हैं। कई वारदात होते है जिनका कोई सुराख नही मिलता। चिंतनीय विषय हैं, बेटा भाई, और एक पिता बन मातृशक्तियों की ढाल बनो तब माता रानी प्रसन्न होगी व कन्या पूजन की सार्थकता सिद्ध होगी। शिवशक्ति के संयोग से ही नर और नारी बन इस लोक में सांसारिक जीवन की गाड़ी चलती हैं। नारी भोग्य की वस्तु नही हैं, सम्मान की अधिकारी हैं। वह शोषित – पीड़ित और दुखी नहीं,शक्ति की भी अवतारी हैं यह -सभी को स्वीकार करना ही होगा। हर समय नारी को अपनी बेगुनाही को प्रमाणित करना पड़ता हैं। माता सीता जैसी पतित- पावनी देवी को भीअग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ा। आइये ! हम सभी मिलकर एक ऐसे माहौल का निर्माण करे जहाँ माँ, बहन और बेटियां सुनी सड़को में बेखौफ जा सके। सहमी_ डरी और दहशत में न हो भारत की नारियां। एक ऐसी न्याय व्यवस्था हो जहाँ रूह कांप जाये दरिंदो की किसी बेटी की तरफ आंख उठाने से पहले। तब देवी दुर्गा अपने नौ रूपों में आपकी हर इच्छा पूरी करेगी, और नारी को शब्दों में माँ का दर्जा देने की बजाय हृदय की गहराइयों से, पवित्र भावों से वंदनीय, पूज्यनीय बनाए। जिस घर में नारी दयालु, धर्मनिष्ठ, पारिवारिक, सेवाभावी, त्यागी सहनशील, ममतामयी, पतिव्रत और हर रिश्तों को संजोकर रखती हैं, उस घर में माँ, बहन बेटी के रूप में साक्षात मातारानी होती हैं। नारी ही संवारती हैं आपने हर रूप में परिवार रूपी महकती इस रंग-बिरंगी बागबान को सदा ही सम्मान दें, देवी की उस अवतार को।
अर्धांगनी बन अपने वजूद को ढूँढती हूँ,
तब जाकर पूर्णरूपेण नारी कहलाती हूँ।
अबला नहीं सबला बन कार्य करती हूँ,
हर पल अग्नि परीक्षा भी देती रहती हूँ,
मैं भारत की साहसी नारी बन रहती हूँ।।

——————————————–






