कवयित्री चन्द्रमती चतुर्वेदी ‘चन्दू’ बस्ती, अयोध्या धाम
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w) 6395080071
क्या नादान समझते हो
बात बदलकर बातें करते, क्यों बहकाते हो,
नादान समझते हो क्या मुझको, जो बहकाते हो?
कभी प्यार की बातें करते, कभी रूठ जाते हो,
कभी पास आने की कहते, कभी दूर जाते हो।
किस उलझन में मुझको साजन, रोज फँसाते हो,
नादान समझते हो क्या मुझको, जो बहकाते हो?
तेरी हर इक बात का मैंने, सच ही माना था,
तेरे मीठे बोलों में अपना, सुख पहचाना था।
अब झूठे वादों से क्यों दिल को भरमाते हो,
नादान समझते हो क्या मुझको, जो बहकाते हो?
मैंने चाहा सच्चे मन से, तुमको अपने प्रीतम,
तुमने मेरी चाहत को ही, समझ लिया क्या भ्रम?
कभी हँसाते, कभी रुलाते, क्या सुख पाते हो,
नादान समझते हो क्या मुझको, जो बहकाते हो?
प्रेम अगर सच्चा है तो फिर, खुलकर बात करो,
मन में जो भी बात छिपी है, मुझसे आज कहो।
क्यों शब्दों के जाल बिछाकर, राह भुलाते हो,
नादान समझते हो क्या मुझको, जो बहकाते हो?
सुन लो मेरी बात पिया जी, प्रेम खिलौना नहीं,
दिल के सच्चे रिश्ते में कोई, छल या धोखा नहीं।
सच की राह छोड़कर बोलो, कहाँ को जाते हो,
नादान समझते हो क्या मुझको, जो बहकाते हो?






