ब्यूरो देहरादूनः (नया अध्याय)
नवीनतम गढ़वाली काव्य संग्रह प्रकृति अर प्रेरणा का दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र देहरादून में लोकार्पण।
उत्तराखण्ड: देहरादून कवि अरविन्द ‘प्रकृति प्रेमी’ के नवीनतम गढ़वाली काव्य संग्रह प्रकृति अर प्रेरणा का गुरुवार 29 अक्टूबर 2026 को दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र देहरादून में लोकार्पण प्रधान संपादक मदन मोहन डुकलाण की अध्यक्षता में किया गया। इस कार्यक्रम के बतौर मुख्य अतिथि साहित्यकार, रंगकर्मी डाॅ. नन्दकिशोर हटवाल, जबकि विशिष्ट अतिथि साहित्यकार, गढ़वाली भाषा के एक्टिविस्ट शान्ति प्रकाश ‘जिज्ञासु’ रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए मदन मोहन डुकलाण ने कहा कि अरविन्द ‘प्रकृति प्रेमी’ की कविता आस जगाती हं वे एक जगा कदमताल करती कविताओं को एक कदम आगे बढ़ाती दिखाई देती हैं और आखिर में ये तो बोला ही जा सकता है कि अरविन्द ‘प्रकृति प्रेमी’ की कविता अंध्यारा छंटाती और मानव और समाज को उजाले की ओर ले जाती है। डाॅ. नन्दकिशोर हटवाल ने कहा कि संग्रह की कविताओं में प्रकृति, पर्यावरण के प्रति प्रेम के साथ-साथ अंधविश्वास, सामाजिक अन्याय और कुप्रथाओं के प्रति असंतोष भी दिखाई देता है। उनकी कविताओं में यत्र-तत्र मुहावरों का असदार प्रयोग और प्रभाव भी देखने को मिलता है। ठेठ गढ़वाली शब्दों का प्रयोग इस संग्रह की एक और विशेषता है। जबकि वहीं शान्ति प्रकाश ‘जिज्ञासु’ ने कहा कि प्रकृति प्रेमी के इस संग्रह की कुछ कविताओं का यदि हिन्दी में अनुवाद किया जाय तो ये निश्चित ही बड़े स्तर की कविताएं हैं। वे चेतना और विचार के स्तर पर आगे बढ़ रहे हैं ऐसी रचनाएं गढ़वाली कविता साहित्य को राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर भी अपनी पहचान बनायेंगी। उनकी कविताएं न सिर्फ एक कदम आगे बढ़ी बल्कि परिष्कृत हो रही हैं। पुस्तक की विवेचना करते हुए साहित्यकार शिवदयाल ‘शैलज’ अपने वक्तव्य में कहा कि कवि प्रकृति प्रेमी के प्रकृति अर प्रेरणा कविता संग्रह में वर्तमान की छंदमुक्त, विचार प्रधान, और चिंतन प्रधान कविता के दर्शन होते हैं। ये कविताएं समकालीन कविता के साथ-साथ चलते हुये समाज में गहरी जड़ें जमाये विसंगतियों, विदू्रपताओं, पाखण्ड और आडम्बर पर भी तीक्ष्ण कटाक्ष करती हैं। जो वर्तमान गढ़वाली कविता के लिए नये रास्तों को दिखाने और खोजने का कार्य करेंगी। संग्रह के भूमिकार डाॅ. उमेश चमोला ने अपने वक्तव्य में कहा कि अरविन्द ‘प्रकृति प्रेमी’ की कविताएं प्रकृति और मनुष्य के आपसी संबंधों को दिखाती हैं। ये आज के समाज के कंटीले यथार्थ से उपजी कविताएं हैं। इनमें साामजिक कुरीतियों और अंधविश्वास पर गहरी चोट की गई है। वहीं डाॅ.सत्यानन्द बडोनी ने कहा कि यहां कवि की कविताओं में टिरियाली खासकर कि भिलंगना और बालगंगा घाटी के विलुप्त हुए शब्दों को जीवंत करने की चेष्टा की गई है जो गढ़वाली भाषा भण्डार का समृद्ध करने में सफल हो पायेगा। ऐसा मुझे विश्वास है इन शब्दों में भैंणु, अबलिखा, सम्यार, तर, खगळ, साबळ्या बर्खा साळ स्यंरा जैसे कई शब्दों से हमारी शब्द सम्पादा में श्रीवृद्धि कर ली है। कविताओं में मानकीरण का भी विशेष ध्यान रखा गया है। यह भी मानकीरण यात्रा में कवि की अपनी तरफ से सकारात्मक पहल मानी जा सकती हैं। इस कार्यक्रम का सफल संचालन कवयित्री बीना बेंजवाल ने किया। इस अवसर पर राज्य भर के साहित्यकार…………………..और गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।






