राजकुमार कुम्भज जवाहरमार्ग, इन्दौर
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w)6395080071
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असमान गुजर गया जीवन।
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बीत गया बहुत कुछ बीत गया
मौसम भी बदलते गए तमाम धीरे-धीरे
शेष मुखौटे भी बचे नहीं शेष फिर कहीं
सच कहते शेष रह गईं ज़ुबाने सबकी शेष
झूठ सुनते-सुनते पत्थर हो गये कान तक
ऊँचाइयों पर टँगा रह गया आसमान
असमान गुजर गया जीवन।
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समय हुआ मैं सो गया।
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सोचा था कभी ये भी था सोचा
कि जीवन में जीवन की निरंतरता होगी
और उस निरंतरता में थोड़ी कविता होगी
कविता में फिर कविता जैसा जीवन होगा
और जीवन में जीवन जैसी कविता होगी
जो था सब कुछ उलट-पलट हो गया
समय हुआ मैं सो गया।
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