बीएल भूरा चन्द्र शेखर आजाद नगर भाबरा, मध्य प्रदेश
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड (w) 6395080071
म्हारी बोली म्हारी माटी म्हारो गांव –
म्हारी बोली म्हारी माटी, म्हारो गांव म्हारी शान,
म्हारी संस्कृति म्हारी गुजराती बोली, म्हारो
अभिमान। माटी में महके म्हारी बोली,
महुडा जेवुं पाणी, ई बोली वगर जिंदगी, लागे सुनी कहानी।
हाँव, कईम, आवजे, केम छो म्हारी वाणी,
सुणके परदेशी भी बोले, मीठी लागे घणी।
माँ नी लोरी बोली में, मिश्री जेवुं लागे,
दादा नी वात में इतिहास जागे।
मक्का नो रोटली, मिर्ची नी चटनी नो स्वाद,
बोली में पूछे, आवो खावो म्हारे गांव।
ढोल ढोलकी वागे, बोली में गीत गवाय,
भगोरिया नो मेलो, बोली वगर अधूरो थाय।
म्हारा खेत लहलहाटे, म्हारी बोली में पुकार,
म्हारा ढोर-ढांखर भी समझे, बोली नो प्यार।
तीज-त्यौहार म्हारा, बोली में ज सजे,
संस्कृति नो दीवो, बोली थी ज बळे।
मालमसुरी भाबरा नी धरती,
वीरों नी भूमि कहलाय,
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परथी भाई भूरा नुं नाम, अही गूंजी जाय।
ई धरती पर जन्मी, म्हारी पटेलिया बोली,
ई बोली में ज लखी, आजादी नी टोली।
बोली गई तो माटी रूठे, गांव सुना थाय,
बिना बोली नो मानवी, मूल थी कट जाय।
गुजराती अंग्रेजी भले पढ़ो, खूब कमावो नाम,
पण म्हारी बोली ने भूलसो तो,
नहीं रहे कोई काम।
म्हारो गांव प्यारो, अलीराजपुर जिला नो तारो,
म्हारी बोली में वसे, म्हारो परिवार सारो।
घर-घर में गूंजे, म्हारी बोली नो नाद,
सुणके दिल झूमे, आवे बहु याद।
पटेलिया छुं हुं, गर्व थी कहुं छुं,
गुजराती बोली में, गीत गाउं छुं।
लीबडा नो ठंडो छांयो, बोली नो सहारो,
ई बोली ज म्हारो, जीवन नो किनारो।
सासु बोले वहु ने, बोली में ज सीख,
संस्कार नो पाठ, बोली में ज दीख।
छोरा-छोरी रमे, बोली बोलता जाय,
संस्कृति नी वेल, एवी वधती जाय।
हाट में जावो तो, बोली में ज भाव,
बोली में ज थाय, साचो लेन-देन नो चाव।
कोई परदेशी आवे, तो बोली में ज मान,
पटेलिया बोली थी ज, वधे म्हारो शान।
लाल माटी म्हारी, काळी माटी म्हारी,
ई माटी में ज वसे, बोली म्हारी प्यारी।
गांव नी पगडंडी, बोली ने ओळखे,
झाड़-नदी भी म्हारी, बोली ने परखे।
दिवाली आवे तो, बोली में ज गीत,
होली आवे तो, बोली में ज प्रीत।
लग्न-प्रसंग में, बोली ज गूंजे,
ढोलकी नी थाप पर, बोली ज झूमे।
भूली जावो मत, म्हारी बोली ने भाई, बहनों
ई तो छे म्हारी, सच्ची पहचान छे।
बाप-दादा नी थाती, बोली ज छे,
ई ने बचावी तो, पीढ़ी तरसे।
शहर में जावो तो, सूट-बूट पहेरो,
पण गांव में आवो तो, बोली में ज हेरो।
अंग्रेजी बोले दुनिया, भले बोले सारो,
पण म्हारी बोली वगर, सब लागे खारो।
म्हारी बोली सीधी, कोई आडंबर नथी,
ई में ज साचो प्रेम, कोई दंभ नथी।
जो बोले म्हारी बोली, ए म्हारो भाई,
ई ने ज म्हारे, गले लगावी जाई।
खेत में हल हांके, बोली में ज बूम,
बीज वावे त्यारे, बोली में ज धूम।
पाणी पावे त्यारे, बोली में ज गीत,
कापणी करे त्यारे, बोली में ज प्रीत।
परथी भाई भूरा नो नाद, मालमसुरी थी गूंज्यो,
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, अही थी ज धूंज्यो।
ई वीर नी धरती पर, म्हारी बोली उगी,
ई बोली में ज क्रांति नी, ज्वाला जगी।
म्हारा दादा कहता, बेटा बोली बचावजे,
ई ज म्हारी माटी, ई ने मत भुलावजे।
बोली ज म्हारो धर्म, बोली ज कर्म,
बोली थी ज जड़ायो, म्हारो हर मर्म।
छोरी परणावे तो, बोली में ज गीत,
दिकरो जनमे तो, बोली में ज प्रीत।
मरण-जीवन सब, बोली में ज थाय,
बोली वगर सब, अधूरो रह जाय।
गुजरात , दाहोद नी सीमा, मध्यप्रदेश,
राजस्थान बारां जिला नो संगम,
पटेलिया बोली बोले, हर हृदय में उमंग।
ना गुजराती थी अलग, ना हिंदी थी न्यारी,
सब बोली नो संगम, म्हारी बोली प्यारी।
हांव करो तो लागे, अपनो-अपनो भाव,
कईम छे कहो तो, आवे मीठो चाव।
आवजे कहो तो, दिल में प्यार जगे,
बोली नो पहचान, सब पर असर करे।
सरपंच बोले बोली में, तो गांव समझे,
शिक्षक बोले बोली में, तो बच्चा समझे।
डॉक्टर बोले बोली में, तो दर्द मिट जाय,
बोली में ज साची, सेवा थई जाय।
म्हारी संस्कृति म्हारी बोली, बन्ने एक समान,
एक गई तो दूजी, रहसे नहीं जवान।
संस्कृति ने बचावी तो, बोली बचसे,
बोली ने बचावी तो, गांव बचे।
नई पीढ़ी ने कहुं, सुनो ध्यान लगाई,
मोबाइल में दुनिया, पण बोली भुलाई न जाई।
रील बनावो भले, पण बोली में बनावो,
म्हारी बोली ने विश्व भर में, गजवावो।
माटी नो टीको, माथे लगावो,
बोली नो गर्व, दिल में जगावो।
गांव नो नाम, ऊँचा करावो,
संस्कृति नो दीवो, घर-घर जलावो।
पहाड़ बोले, नदी बोले, बोली म्हारी बोले,
झाड़ बोले, पाणी बोले, माटी म्हारी बोले।
गांव नो कण-कण, बोली में ज गाये,
म्हारी गुजराती पटेलिया, सब ने भाये।
भूख लागे तो बोली में, माँ रोटली देती,
तड़स लागे तो बोली में, पाणी पाती।
दुःख पड़े तो बोली में, दिलासो देती,
बोली तो म्हारी माँ जेवुं, काम करती।
हुं गर्व थी कहुं, हुं पटेलिया समाज छुं,
म्हारी बोली पर, गर्व थाउं छुं।
कोई लाख कहे, पण नहीं भूलूं,
म्हारी बोली ने, हदय में राखूं।
आवो सब मिलके, एक प्रण लईए,
म्हारी बोली ने, अमर करईए।
बच्चा-बच्चा ने, बोली सिखाड़िए,
गांव-गांव में, बोली गजवाड़िए।
म्हारी बोली म्हारी माटी, म्हारो गांव म्हारो प्यार,
म्हारी संस्कृति म्हारी गुजराती बोली,
म्हारो पहचान आधार।
ई ने छोड़के क्यां जावो, क्यांय सुकून नथी,
बोली वगर जीवन में, कोई जूनून नथी।
हुं ‘बीएल भूरा’ लखुं छुं, हाथ जोड़के अर्ज करुं छुं,
‘चन्द्र शेखर आजाद नगर’, थी,
बोली ने वंदन करुं छुं।
म्हारी बोली म्हारी माटी म्हारो गांव म्हारी संस्कृति,
ए ज म्हारी गुजराती पटेलिया बोली,
ए ज म्हारी सच्ची प्रकृति।






