सुश्री सरोज कंसारी लेखिका एवं कवयित्री नवापारा राजिम, रायपुर (छ. ग)
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड (w) 6395080071
गिरा, उठा और जीत गया (लघुकथा)
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माँ को वह जिद करने लगा कि – “माँ, कल स्कूल में वार्षिक खेल प्रतियोगिता का आयोजन है, मैं भी दौड़ में भाग लूँगा।” माँ चिंता में पड़ गई। डॉक्टर ने कहा था, बालक कमजोर है, इसे ज्यादा थकान न हो, उस बात का ध्यान रखना। खेलने का उसे बहुत शौक था। माँ ने मना किया – “नहीं बेटा, तुम्हारी तबियत खराब रहती है, तुम नहीं दौड़ सकते।”
वह जिद करने लगा, फिर भी माँ नहीं मानी। वह स्कूल गया। सभी को खेलते देखकर उसका भी मन किया, पर वह हार जाने से डरता था। यही सोचकर उसने शुरुआत ही नहीं की। एक बार उसके सभी दोस्त स्कूल के खेल में भाग लिए, यह अकेले बैठा रहा उदास। उसके शिक्षक ने उसे देखकर कहा – “तुम क्यों नहीं खेल रहे?”
उसने कहा – “माँ ने मना किया है। मैं कमजोर हूँ। ज्यादा दौड़ नहीं पाऊँगा, हार जाऊँगा। तबियत भी खराब हो जाएगी, इसलिए मैंने हिस्सा नहीं लिया।” शिक्षक ने कहा – “तुम्हें मन है खेलने का?”
उसने मासूमियत से हामी भरी।
शिक्षक ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा – “एक बार कोशिश अवश्य करो, भले ही धीरे दौड़ो, पर मन से हारने का डर निकाल दो। धीरे ही खेलो, अपने मन को निराश मत करो, नहीं खेलकर।”
यह सुनकर उसने हिम्मत की और खेलने गया। कुछ दूर दौड़ा, उसकी साँस भर गई, वह गिर गया और रोने लगा! वह डर के कारण उठ नहीं पाया। उसके शिक्षक ने कहा – “उठो और दौड़ो।”
उसने कोशिश की। इस बार वह दूर तक दौड़ा और दूसरी बार भी गिर गया। अब की बार उसमें साहस आ गया, डर खत्म हो गई। वह खुद उठा और तेज दौड़कर प्रथम स्थान पर आ गया। उसे मेडल मिला, बहुत तालियाँ बटोरीं, बेहद खुश हुआ। माँ को आकर बताया – “मैं प्रथम आया हूँ”, तो उसे यकीन नहीं हुआ। उसने कहा – “कैसे हुआ? तुम तो तेज भाग नहीं सकते।”
बेटे ने कहा – “गिरा, उठा और जीत गया।”






