राजेन्द्र रंजन गायकवाड (सेवा निवृत जेल अधीक्षक) बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w)6395080071
कर्मफल (भाग 24)
सगाई के बाद राजन और लज्जो के बीच जैसे एक नया संसार खुल गया। दोनों एक-दूसरे के लिए अब केवल परिचित नाम नहीं थे। उनके मन में धीरे-धीरे विश्वास और अपनत्व की जगह बन रही थी। उस समय आज की तरह संदेश भेजने के अनेक साधन नहीं थे। उनके भावों का सहारा प्रेम – पत्र ही थे। पूरे एक वर्ष तक उनके पत्र नियमित रूप से आते-जाते रहे कभी संकोच से भरे, कभी भविष्य के सपनों से, तो कभी घर-परिवार की छोटी-छोटी बातों से लबरेज़ कहानियाँ राजन अपने मित्रों को दिखाता दूसरी तरफ सज्जो की सभी सहेलियाँ भरतपुर (राजस्थान ) रेलवे कालोनी वाली भी , सज्जो के अलावा पोस्टमेन का इंतज़ार करती हैं । सज्जो की माँ शशि जी ये सब देखकर मन ही मन खुश होती और ऊपर से झूठा -मूठा सबको गुस्सा करती ।
राजन अपने पत्रों में गजब की शेरो- शायरी के साथ ही अपने आने वाले जीवन की योजनाएँ लिखता, वह चाहता था कि मेहनत और समझदारी से एक राज- पत्रित अधिकारी बनकर अपने घर को सुखी बनाए, परिवार की ज़िम्मेदारियाँ निभाए और लज्जो को मान-सम्मान से रखे। लज्जो अपने सरल स्वभाव में लिखती कि उसे घर-गृहस्थी के काम अच्छे लगते हैं, घर सँभालना, सबके लिए कुछ करना और परिवार के बीच रहना उसे सुख देता है। फिर वह अपने मन का एक और कोना खोलकर लिखती है कि उसे गाने का बहुत शौक है । राजन उसके ये शब्द पढ़कर मुस्करा उठता और कल्पना करता कि कभी उनके घर की शामें लज्जो के गीतों से भर जाएँगी। एक साल कैसे बीता पता ही नहीं चला ।
जून 1985 में दोनों का विवाह तय हुआ। विवाह परंपरागत रीति से, पर पूरी सादगी के साथ संपन्न होना था। घर में तैयारियाँ शुरू हुईं कहीं रिश्तेदारों के आने की चर्चा, कहीं कपड़ों और ज़रूरी सामान की व्यवस्था, तो कहीं विवाह के रीति-रिवाजों की तैयारी तो थी लेकिन उत्सव का वैभव बड़ी सजावट में नहीं, बल्कि परिवार के स्नेह, बड़ों के आशीर्वाद और सबकी भागीदारी में था।
विवाह के दिन राजन दूल्हा बनकर लज्जो को ब्याहने पहुँचा। मंगलगीतों, शुभकामनाओं और पारिवारिक रस्मों के बीच विवाह के संस्कार पूरे हुए। अग्नि के सामने लिए गए वचनों के साथ दोनों ने नए जीवन की शुरुआत की। लज्जो की विदाई का समय आया तो मायके का आँगन भावुक हो उठा। माता-पिता और अपने लोगों से बिछुड़ने की पीड़ा उसके चेहरे पर थी, राजन ने उसे भरोसे से अपने साथ लिया। उसके लिए लज्जो केवल दुल्हन नहीं, जीवन-संगिनी थी जिसे वह पूरे आदर और अपनत्व के साथ अपने घर ले जा रहा था।
घर पहुँचने पर माँ, बहन और रिश्तेदारों ने वर-वधू का द्वारचार और नेगाचार से स्वागत करते हुए परंपरा के अनुसार आरती उतारी गई, मंगल-तिलक लगाया गया और शुभता के प्रतीक अक्षत-दूर्वा से आशीष दिया गया। घर की देहरी पर लज्जो का स्वागत करते हुए बड़ों ने उसके सुखी दांपत्य और घर में मंगल बने रहने की कामना की। हँसी-मज़ाक और नेग की छोटी-छोटी रस्मों ने विदाई की उदासी को कुछ हल्का कर दिया। बहनें और रिश्तेदार राजन से नेग माँगते, वह मुस्कराकर उनकी बात मानता और सबके बीच अपनत्व का वातावरण बन जाता।
उस दिन लज्जो ने नए घर की देहरी पार की तो उसके साथ केवल दुल्हन का साज नहीं, बल्कि अपने संस्कार, सपने और मधुर स्वभाव भी आए। राजन ने उसे अपने घर का हिस्सा ही नहीं, अपने भविष्य का सबसे प्रिय साथी माना। सादगी से संपन्न उस विवाह में रीति-रिवाजों की गरिमा, परिवार का स्नेह और दो मनों के बीच एक वर्ष में पनपा विश्वास तीनों एक साथ दिखाई देते हैं। हीरा माँ नवेली बहु के आगमन पर मुहल्ले कि सभी महिलाओं के लिए मंगल गीत गाने और नई दुल्हन का नया नाम रखने लिए आमंत्रित करती हैं। जैसे ही गीतों की मंडली परवान चड़ती है,,,सज्जो अपने पसंद गीत गाते हुए जब ढोलक की थाप देती है तो सभी महिलाओं की खुशी का ठिकाना नहीं रहता । पिता गणेश भी नई बहु के आने अपनी पुरानी दोस्ती और आदतें सुधर लेते हैं। सभी अपने अपने काम से लग जाते हैं ।
राजन शादी के छः दिन सज्जो को मायके परंपरा- अनुसार भेज कर अपनी बैंक ड्यूटी करने भोपाल जाकर नया किराये का मकान तलाश करता है। शादी के पंद्रह दिन बाद सज्जो अपने भाई देव के साथ भोपाल राजन की नयी दुनियाँ बसाने पहुँचती है। राजन ,सज्जो का प्रवेश रवींद्र संगीत विद्यालय में कराता है तो सज्जो को लगता है कि अब उसके सारे सपने पूरे होंगे। चार दशक पहले लड़की पढ़ाना , उसके पसंदीदा कपड़े पहनना, लड़कों से बात करना पारिवारिक ही नहीं एक सामाजिक बुराई माना जाता था। लेकिन भोपाल शहर राज्य की राजधानी होने के कारण इस मामले में सागर / दमोह से आगे निकल चुका था। मेरिन ड्राइव (वन – विहार) मानव -संग्रहालय, भारत भवन, गांधी भवन, हिन्दी भवन, टैगोर भवन और ब्रिटिश लाइब्रेरी न्यू मार्केट राजन के जाने – पहचाने केंद्र हैं। इन जगहों पर राजन, सज्जो को घुमाने ले जाता है। ये वही जगहें हैं जहां, कभी सुमन के साथ दरख्तों पे तो कभी लाल -घाटी की मजबूत शिलाओं पर अपने नाम लिखकर, आसमान से कहता – तपना/ बरसना पर हमारे नाम मत मिटाना ।
व्यक्ति का स्टैटस क्या बदलता है ,,पूरा व्यक्तित्व की बदल जाता है। राजन और सज्जो हर रविवार रंगमहल टाकीज में नई फिल्म देखते , सब्जी बाज़ार खरीदते समय, इमरती /जलेबी /छोले – भटूरे ऐसे चाव से खाते कि फाइव स्टार होटल वाले इन्हें देख लें,,तो इंफीरटी – कॉमलेक्स में चले जाए ।
(शेष भाग कल)






