संवाददाता छत्तीसगढ़ः सरोज कंसारी
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ग्रामीण अंचल में गूंजने लगे सुवा नृत्य के पारंपरिक गीत, लोक संस्कृति की छटा बिखेर रहीं महिलाएं एवं युवतियां
राजिम: ग्राम बकली में दीपों के पर्व दीपावली की आहट के साथ ही छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति और पारंपरिक लोकनृत्य सुवा की छटा पूरे अंचल में बिखरने लगी है। ग्रामीण क्षेत्रों में इन दिनों महिलाओं एवं युवतियों की टोलियां सुवा नृत्य करते हुए चौक-चौराहों और गली-मोहल्लों में नजर आ रही हैं। पारंपरिक वेशभूषा में सजी महिलाएं एवं युवतियां सुवा गीतों की मधुर धुन पर थिरकते हुए छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत कर रही हैं। दीपावली के पहले छत्तीसगढ़ में सुवा नृत्य की विशेष परंपरा रही है। महिलाएं समूह में एक स्थान पर एकत्र होकर बीच में मिट्टी या बांस से बने पात्र में सुवा की प्रतिकृति रखती हैं। इसके चारों ओर गोल घेरा बनाकर तालियों की लय पर पारंपरिक गीत गाते हुए नृत्य करती हैं। इन गीतों में प्रेम, विरह, पारिवारिक जीवन, सुख-दुख और सामाजिक भावनाओं की सुंदर अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। विशेषकर विरह और लोकजीवन से जुड़े गीत इस नृत्य को अलग पहचान देते हैं। नगर के विभिन्न मोहल्लों में सुबह होते ही सुवा नृत्य की टोलियां घर-घर पहुंच रही हैं। महिलाएं और युवतियां सामूहिक रूप से गीत गाते हुए लोगों का मनोरंजन कर रही हैं। वहीं स्थानीय रहवासी भी इन टोलियों का उत्साहपूर्वक स्वागत कर रहे हैं। लोग खुशी से अपनी सामर्थ्य के अनुसार उन्हें नगद राशि भेंट करते हैं। इससे न केवल कलाकारों का उत्साह बढ़ता है, बल्कि वर्षों पुरानी लोक परंपरा को भी प्रोत्साहन मिलता है। आधुनिकता के दौर में भी सुवा नृत्य के प्रति महिलाओं और युवतियों का उत्साह यह दर्शाता है कि छत्तीसगढ़ की लोक परंपराएं आज भी लोगों के दिलों में जीवित हैं। यह नृत्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि आपसी मेल-मिलाप, सामूहिकता और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक भी है। दीपावली के उल्लास के बीच सुवा गीतों की गूंज ने पूरे अंचल में पर्व की खुशियों को और भी खास बना दिया है। नगर से लगे ग्राम परसदा जोशी, पोखरा, हथखोज, रावड़, कोमा, कुम्ही, पसौद और अरंड से पहुंची टोलियों ने बातचीत में बताया कि वे सुबह अपने-अपने घरों से निकलकर दिनभर शहर और गांवों में जाकर सुवा गीत गाती हैं तथा नृत्य करती हैं।






