सड़क की संकेतलिपि।

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शिवानन्द सिंह ‘सहयोगी’,  वाराणसी

सड़क की संकेतलिपि।

 

कुछ समय से आ रही है

नींद टुकड़ों में।

 

हर कथानक स्वप्न के

पगले हुए हैं,

दादुरों के बोल अब

तबले हुए हैं,

है कहाँ नवचेतना भी गीत-

मुखड़ों में।

 

रात अपनी चमक-आभा

खो रही है,

सड़क की संकेतलिपि वह

ढो रही है,

हैं कहाँ संवेदना के तत्व

दुखड़ों में।

 

राज प्रतिनिधि बादशाहों

का जमाना है,

मुख्यमंत्री राज्य का

पैतृक घराना है,

है बहुत प्रतिद्वंदिता के सत्व

उखड़ों में।

 

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