डॉ सतीश चन्द्र मिश्र, ग्राम+ पोस्टाफिस= कोबरा,
जिला – चित्रकूट, उत्तर – प्रदेश,
लघुकथा।
“बीच का रास्ता”
डॉ सतीश “बब्बा”
राम की रातों की नींद, दिन का चैन सब कुछ खो गया था। इसी राम की कल्पना थी मेरे बेटे पढ़-लिख कर, बड़े होकर पहले तो आफीसर बनेंगे और नहीं आफीसर बन पाएंगे तो, तृतीय, चतुर्थ श्रेणी की नौकरी तो पा ही जाएंगे।
राम को क्या पता था कि, उसकी उम्मीद धरी की धरी रह जाएगी और ए बेटे कुछ भी नहीं बन पाएंगे। बेरोज़गारी और आरक्षण सरकारी नीतियों के कारण भी ऐसा हो गया है।
राम ने कर्ज के साथ जमीन बेंच डाली थी और फिर पत्नी की बीमारी बेटों की शादियां फिर किसान क्रेडिट कार्ड का लोन, जो बढ़कर अब बीसों लाख हो गया था।
इज्जतदार राम पर दबाव बढ़ा और समझौते पर हस्ताक्षर राम ने इस लिए कर दिए थे कि, कुछ महीने दो महीने का समय मिल जाएगा शायद कोई रास्ता निकल आए।
जैसे – जैसे जून आ रहा था, राम की धुकधुकी तेज हो रही थी। राम करे तो क्या करे? बची जमीन बेचता है तो बच्चे क्या खाएंगे? यही बेटे नहीं समझेंगे और बाप को दोष देंगे!
गांव, परिवार तो बस मसाला पा जाएंगे; राम जैसे ईमानदार इंसान को जलील करने का।
राम सोचता है आत्महत्या करना बुजदिली होगी लोग बेटों को धिक्कारेंगे! लोगों के बीच रोज – रोज मरना भी ठीक नहीं है। यहां तो लोगों के व्यंग्य सह पाना राम के लिए मुश्किल होगा।
राम ने बीच का रास्ता अपनाया और एक दृढ़ निश्चय किया। और सोने का प्रयास करने लगा; सो कैसे सकता था नींद तो कोसों दूर थी।
एक साल बीत गया। राम के लड़के और पोते, पता लगाते – लगाते थक गए; फिर भी राम का आज तक कहीं अता – पता नहीं चला।








