सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री-लेखिका-शिक्षिका
अध्यक्ष – दुर्गा शक्ति समिति
गोबरा नवापारा-राजिम। [रायपुर, छ.ग.]
(नया अध्याय, देहरादून)
‘अंधेरे से परे एक रौशनी’
(कविता)
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माना, ग़म का घना अंधेरा है।
वक़्त की गर्दिश ने हमें घेरा है।।
हर साँस पर दर्द का पहरा है
क्यों लम्हों ने फिर ज़ख़्म कुरेदा है?
चेहरों पर बस उदास लकीरें हैं।
सहमी शामें, दहशत-ज़दा रातें हैं।
अख़बारों में रोज़ मौत के चर्चे हैं
हर दिल में अनगिनत करुण किस्से हैं।
पल-पल हिम्मत की लौ जलानी है।
हर सुबह एक नया अफ़साना है।।
इन फ़िज़ाओं में फिर मुस्कुराना है।
ये नाज़ुक दौर है, मजबूत बन जाना है।।
बेसहारा के हमको सहारा बन जाना है।
डर की दीवारों में कैद हैं जो, उन्हें आज़ाद कराना है।।
फ़र्ज़ की राह पर समर्पित हो जाना है।
हर मन में मंगल-भाव जगाना है।।






