राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त)
केंद्रीय जेल अधीक्षक
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
मजदूर की प्रार्थना
ये हाथों ने बनाए कितने मंदिर,
कितनी मस्जिदें, कितने दरगाह-गुरुद्वारे।
पत्थर तराशे, ईंटें जोड़ी,
गुंबद उठाए, शिखर चढ़ाए।
भगवान के घर में ज्योति जलती है,
अल्लाह के द्वार पर अजान गूंजती है।
मेरा झोपड़ा अभी भी अंधेरा,
बारिश में टपकती छत, ठंड में काँपता शरीर।
मैंने राम का मंदिर बनाया,
मैंने राहिम का घर खड़ा किया।
फिर भी मेरी रोटी सूखी,
मेरी औलाद भूखी सोती है।
न कोई भगवान उतरता है मेरी झोपड़ी में,
न अल्लाह मेरे घाव पर मरहम रखता है।
सिर्फ़ ये हाथ हैं,
जो हर रोज पत्थर से लड़ते हैं।
मंदिर-मस्जिद के रसूख की बात मत करो भाई,
मैं तो बस एक मजदूर हूँ,
जिसके हाथों ने हजारों देवता बसाए,
पर खुद का संसार अभी भी अधूरा है।
एक दिन जब ये हाथ थक जाएँगे,
तो पूछूँगा उनसे—
“हे प्रभु, हे रब,
जो घर तुम्हारे हमने बनाए,
मेरा घर कब बनोगे?”
कर्म ही पूजा है,
मेहनत ही इबादत है।
बाकी सब कहानियाँ,
सिर्फ पत्थर और शब्दों की हैं।






