सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री/लेखिका/शिक्षिका
अध्यक्ष – दुर्गा शक्ति समिति
गोबरा नवापारा-राजिम, रायपुर, छ.ग.
(नया अध्याय, देहरादून)
अनवरत: धुन अपनी!
( कविता )
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गम के आँसू पोंछ ले बंदे,
जग में इनका मोल नहीं।
उठ, हिम्मत कर, चल अब तू,
चुनौतियों को बोल सही।
किसका करता इंतज़ार तू,
क्यों किसी का मोहताज बने?
मेहनत पर रख विश्वास अटल,
शिकवे सारे छोड़, आगे बढ़े।
डर किस बात का पाले मन में,
चल अनवरत अपनी राह पर।
थक के रुकना नहीं है तुझको,
जीत की खातिर भर उड़ान फिर।
सहनशीलता बेमिसाल रख,
वक़्त ही सबसे बड़ा सिकंदर।
न कोई अपना, न कोई बेगाना,
किस्मत का बस ये खेल है सुंदर।
ये युग हुआ पशुसमान सारा,
हर ओर छल का जाल पसारा।
तू हार न मान इंसानियत से,
बन हिम्मत का उजला सितारा।
हँसीन लम्हों को यूँ न गँवाना,
अपनी धुन में तू गुनगुनाना।
ये दुनियां कहे चाहे कुछ भी,
पर अपनी हद कभी न भुलाना।
टूट के भी तू मुस्कुरा देना,
उम्मीदों की लौ जला लेना।
दिलकश अपने व्यवहार से,
हर नफ़रत को मिटा देना।
अंतस में न पाल कोई बैर,
दिल किसी का तू न दुखाना।
बाद में रह न जाए पछतावा,
दर्द को ही मरहम समझ जाना।







